जाने क्यूं सच कभी-कभी कमजोर सा मालूम होता है, मन मेरा भी कभी-कभी इक चोर सा…
Category: कुछ नया
तुम्हें कोई अधिकार नहीं है
तुम्हें कोई अधिकार नहीं है दूसरों के बारे में कुछ भी कहने का। कुछ भी लिखने…
संबंधों में प्रेम कहां, अब तो रिश्ते अनुबंध हो गए
प्रतिक्षण धूमिल होती स्वासों पर अवसादों की सांकल है। पंख विहीन मरणासन्न पंछी की तरहां तन-मन…
उन्मुक्त भाव से विचरण कर
उन्मुक्त भाव से विचरण कर नभ पर पदचिह्न बनाती चल अपनी क्षमता के बलबूते सागर पर…
मैं अचंभित हूँ, कोई मेरी इस कहानी पर तालियाँ भी नहीं बजाता।
पर्दा-बेपर्दा नाटक पर्दा नाटक दृश्य –1 महाराज 12 वर्षों के बाद वन से लौटे हैं। हर तरफ प्रसन्नता…
क्या होगा- भाग-2
पाकीजाओं की इस कहानी का अंत क्या होगा? मेरे किस्से (क्या होगा–(1)???) की पाकीजा अचानक एक सुबह…