मैं अचंभित हूँ, कोई मेरी इस कहानी पर तालियाँ भी नहीं बजाता।

पर्दा-बेपर्दा नाटक

पर्दा नाटक 

दृश्य –

महाराज 12 वर्षों के बाद वन से लौटे हैं। हर तरफ प्रसन्नता का माहौल है। मंच पर हर ओर दिए जल रहे हैं। लेकिन ये क्या..!! रनिवास से रोने की आवाजें आ रही हैं।

महाराज- ‘रानी! तुमने हमारे साथ विश्वासघात किया है। यह बालक हमारा नहीं है। तुमने हमारे प्रेम का अपमान किया है।’

महारानी- ‘नहीं महाराज! यह सत्य नहीं है। कुंवर आपका ही पुत्र है। हमने आपके साथ कोई विश्वासघात नहीं किया है।’

महाराज- ‘हम कैसे विश्वास कर लें इस झूठ पर!!! रानी तुम पुत्रविहीन ही रहती, लेकिन कम से कम पर-पुरुष का पुत्र तो ना जनतीं..’

महारानी विलाप कर रही हैं।

 

दृश्य – 2 

महारानी कुलदेवता के मंदिर में विलाप कर रही हैं।

महारानी- ‘हे कुलदेवता! यह कैसा लांछन हमारे चरित्र पर आपने लगा दिया है? मैंने महाराज की प्राप्ति की कामना की थी। पुत्र की इच्छा की थी.. लेकिन इस मूल्य पर तो नहीं!!!

अब आपको ही मेरे सतीत्व को सिद्ध करना होगा। आज अगर आपने स्वयं मुझ पर लगे इस आरोप को नहीं हटाया तो मैं यहीं आपके मंदिर में अपने प्राण त्याग दूंगी।’

इतना कहकर महारानी ने वही मंदिर के पाषाणों पर अपना सर पटकना प्रारंभ कर दिया।

अंततः कुलदेव को प्रकट होना ही पड़ता है। कुलदेव स्वयं महारानी को सौभाग्य का वर देते हैं।

 

दृश्य – 3 

महाराज ने कुलदेव के मंदिर में साक्षात कुलदेव को देखा। राजन को अपनी भूल का एहसास हुआ। पश्चाताप के मारे वो रानी के पैरों में गिर पड़े।

कुलदेव ने राजन को ज्ञान दिया। सब ख़ुशी-ख़ुशी महल लौट आये।

 

दृश्य – 4 

पूरे साम्राज्य में ढोल-नगाड़े की आवाजें गूंज रही हैं। महाराज ने कुंवर को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया।

पूरे साम्राज्य में कुंवर की तस्वीर छपे सिक्के बांटे गए। हर ओर खुशहाली लौट आई।

 

पर्दा गिरता है। लोग तालियाँ बजाते हैं। हर दर्शक अपने-अपने विचारों के हिसाब से नाटक का विश्लेषण करता है।

 

बेपर्दा नाटक 

दृश्य – 1 

साजिद पूरे दो साल बाद शहर से आया है।

आते ही अपनी नन्हीं औलाद को गोद में लेकर झुलाने के बजाय उसने रुबीना पर इल्जाम लगाना शुरू कर दिया।

साजिद- ‘कुलटा! तूने ये क्या किया? मेरे साथ धोखा किया तूने।’

रुबीना- ‘नहीं साजिद ये सच नहीं है। ये राहिल तुम्हारी ही औलाद है। मेरा यकीन करो।’

साजिद- ‘दूर हट बेहया.. अरे तू कुछ भी जनती, मगर पराये मर्द की औलाद तो ना जनती..’

कहकर साजिद ने उसे लात से पीछे धकेल दिया। रुबीना रोती रह गयी।

 

दृश्य – 2 

रुबीना अपने कमरे में अकेली रो रही है। उसके हाथों में उसका खुदा है, जिसे नासमझ लोग जहर कहते हैं। अब उसे इसी से उम्मीद है। उसे यकीन है कि उसका खुदा उसे धोखा नहीं देगा।

अगले ही पल उसने उस जहर को अपने गले में उतार लिया।

 

दृश्य – 3 

रुबीना का स्याह शरीर फर्श पर पड़ा है। उसके कदमो में भी कोई है। कौन? राहिल.. उसे नहीं पता कि उसकी माँ का शरीर इतना रंगीन क्यों हैं। उसे तो स्याह-सफ़ेद का फर्क भी नहीं पता।

 

दृश्य – 4 

शहनाई की आवाज आ रही है। साजिद ने दूसरा निकाह कर लिया है। हर ओर ख़ुशी है। ढोल-नगाड़े बज रहे हैं।

लेकिन कहीं दूर से एक और भी आवाज आ रही है। राहिल की, जो अपनी माँ की कब्र पर बैठा रो-रोकर उसे बुला रहा है। उसे नहीं पता कि वहां से कोई लौटकर नहीं आता।

शाम गहराती जा रही थी। इस ओर ख़ुशी के दिए जल रहे हैं। राहिल के रोने की आवाज लगातार जारी है। कुछ देर में कुछ जंगली जानवरों की आवाज भी आने लगती है। थोड़ी देर बाद राहिल की आवाज खामोश हो गयी।

वो शायद खुदा के फ़रिश्ते हैं जो उस मासूम को इस बेरहम दुनिया में रोता नहीं देखना चाहते थे। उन्हें पता है कि अगर वो इस दुनिया में रहेगा भी तो नाजायज होने का दर्द उसका जीना हराम कर देगा। शायद यही सोचकर वो जंगली जानवर के भेष में आये फ़रिश्ते उसे उस दुनिया में ले गए जहाँ उसकी माँ है।

खुदा के पास…

 

इस बार पर्दा नहीं गिरता है। क्यूंकि इस सच और हमारे बीच कोई पर्दा है ही नहीं।

मैं अचंभित हूँ। कोई मेरी इस कहानी पर तालियाँ भी नहीं बजाता। कोई चर्चा भी नहीं कर रहा है इस किस्से की। 

शायद किसी के पास वक़्त ही नहीं है बिना पर्दे के इस किस्से को देखने का…

और फिर वैसे भी ये किसी राजा-रानी की कहानी थोड़े ही है….!! 

 

 

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