गजल ; रेल में

उत्तर कभी दक्षिण से मिलता है रेल में।
रिश्ता कहाँ कहाँ से निकलता है रेल में।

पंडित व मौलवी कभी होते हैं रूबरू
चट्टान मजहबी मियाँ गलता है रेल में।

चलता हुआ भूगोल दिखाई नहीं देता
दिखता बड़ी तेजी से ये चलता है रेल में।

गर आप अकेले हैं तो निश्चित ही आपका
स्थान कई बार बदलता है रेल में।

कपड़ें हो बदलना अगर खाना हो या पीना ,
गिर गिर के हरेक शख्स सँभलता है रेल में।

विश्राम व गति की जरा यारी तो देखिए
सोते हुए भी तन – बदन हिलता है रेल में।

जरनल है जो बौगी वहाँ एक सीट के लिए
गुस्सा किसी किसी का उबलता है रेल में।

है भीड़ ; किन्तु सुंदरी आ जाय गर कोई
दिल पास बिठाने को मचलता है रेल में।

गोरे का हमसफर कभी काला कभी पीला
यह रंगभेद दानव जलता है रेल में।

टी.टी. पुलिस व वेंडरों का रात में आकर
बेवक्त जगाना बड़ा खलता है रेल में।

दुश्मन है आप जब तलक बौगी के है बाहर
अन्दर गए तो बैर पिघलता है रेल में।

मगही गिलोरियाँ हैं लखनवी के मुँह में
आपस में प्रेम फूल यूँ खिलता है रेल में।

अल्लाह इस जहाँ को एक ट्रेन बना दो
बंधुत्व भाव विश्व का पलता है रेल में।

उपरोक्त गजल स्वर्गीय बी एन झा द्वारा लिखित पुस्तक इन्द्रधनुष से ली गई है ।

 

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