मैं कई बार कह चुका हूँ
अपने साथियों से।
अगर ईमान डिगाना ही है
तो फुटकर पर नहीं
थौक पर डिगाओ।
लाख – दो लाख पर।
और देखिए न
उस दिन तो हद हो गई।
वैसे ये कोई नई बात नहीं है।
पर मैं कितना गिर गया था।
जब बस की खाली सीट पर
दो दस के नोट दिखे।
मेरी आँखें चमक उठीं।
मैं चुपके से बैठ गया
उस सीट पर।
बैठ रहा इस तरह
जैसे कि बैठा हूँ
हीरे की खान पर
छोड़िए भी ,
लाख दो लाख पर
नियत डुलाने में
बड़ी मर्दानगी चाहिए।
लाख दो लाख में
सोए खतरे को –
कौन जगाए ?
ठीक है मैं मानता हूँ
या उस पार या इस पार।
पर कहीं उस पार गया तो ? —-
नहीं भाई नहीं
आखिर मैं एक सम्मानित व्यक्ति हूँ।
पूरे मुहल्ले में मेरी धाक है।
वो मुझे शिष्ट और सज्जन कहते हैं।
और मैं इस पद को
आजीवन छोड़ना नहीं चाहता
इसलिए थौक पर थूकता हूँ।
और खतराहीन फुटकर पर
बखूबी मर मिटता हूँ।
उपरोक्त व्यंग स्वर्गीय बी एन झा द्वारा लिखित पुस्तक इन्द्रधनुष से ली गई है।
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