रिश्तों की महक…!

संजय एम तराणेकर
(कवि, लेखक व समीक्षक)
जिधर भी देखिए सब अपने आप में गुम हैं,
उन्हें समझ ना आता स्वयं पे होता ज़ुल्म है।
जिंदगी में कभी इतने भी व्यस्त न रहा करो,
रिश्ते की महक को ऐसे ही न भुलाया करो।
न जाने कब कैसे कौन किस काम आ जाए,
दिल के घावों पर मरहम आकर लगा जाए।
यहाँ मुलाकातों में कितना सुकून मिलता है, 
हर एक के दिल में प्रेम का पुष्प खिलता है।
हाँ, जिंदगी में रिश्तों की महक बना के रखो,
ऐसे में गिलें-शिकवों का भी स्वाद ना चखो। 
एक-दूसरे को गले लगाओ प्यार को बढ़ाओ,
इस जिंदगी में ‘खुशहाली’ के फूल खिलाओ।