गजल ; हाँ अफसर वो आला है

 

सुने बिल्कुल नहीं जो खोल रक्खे मुँह का ताला है।
प्रशासक है बड़ा बेजोड़ हाँ अफसर वो आला है।

न जाने साकियों से भय मुझे लगने लगा है क्यों ?
अदा बदली हुई है आज , यह संदिग्ध हाला है।

गले में डालने से पूर्व थर थर काँपता तन – मन
मुहब्बत या बमों से युक्त , यह सुन्दर सी माला है।

अंधेरे  की जरूरत है न काले काम की खातिर
हमी ने कर दिया हर वक्त के चेहरे को काला है।

हर एक स्थान पर हर काम पर बदनाम होता हूँ।
अनेकों दोस्त चारों ओर अपने खुद ही पाला है।

उजाले के लुटेरों कम से कम ईमान मत लूटो
अंधेरे के लुटेरों ने भी इसको छोड़ ड़ाला है।

उपरोक्त गजल स्वर्गीय बी एन झा द्वारा लिखित पुस्तक इन्द्रधनुष से ली गई है ।