सतर्क और जागरूक करती है ‘द केरला स्टोरी-2!

जैसा कि विदित हैं, ‘द केरला स्टोरी-2′ वर्ष 2023 में रिलीज हुई फिल्म ‘द केरला स्टोरी’ का सीक्वल है। छोटे बजट की होने के बावजूद पिछली फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छा व्यवसाय किया था. इस कारण सबकी नजरें इसके दूसरे पार्ट की रिलीज़ पर अवश्य ही थी।

कहानी – यह फिल्म तीन लड़कियों की जिंदगी को दिखाती है – इनमें दिव्या (अदिति भाटिया) 16 साल की डांसर, जिसे शोहरत के नाम पर फंसाया जाता है। नेहा (ऐश्वर्या ओझा) एथलीट, जिसे प्यार का भ्रम देकर धोखा मिलता है। सुरेखा (उल्का गुप्ता) यूपीएससी की तैयारी कर रही लड़की, जो एक पत्रकार सलीम जो शादीशुदा व एक बच्ची का पिता भी हैं के साथ रिश्ते में फंस जाती है।इसके बाद होती है जबरदस्ती, हिंसा, डर, धमकी और कुछ रूटीन और दोहराव वाली घटनाएं।

अभिनय – इस फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष सभी कलाकारों का सशक्त व उम्दा अभिनय है। उल्का गुप्ता, अदिति भाटिया और ऐश्वर्या ओझा ने अपने किरदारों में डर, दर्द और उलझन को बहुत ही शिद्दत से पेश किया हैं। सच्चाई इनके अभिनय से झाँकती दिखाई देती है। इनके साथ ही निगेटिव किरदारों में सुमित गहलावत, अर्जन सिंह औजला व युक्तम खोसला ने भी अपने रोल्स में जान डाल दी हैं। इनका अभिनय कहानी को और भी हकीकत के करीब व असरदार बना देती है। सपोर्टिंग कास्ट की बात करें तो खासकर माता–पिता की भूमिका निभाने वाले कलाकार पुरवा पराग, रामजी बाली, राजीव कुमार, श्वेता मुंशी, अभिषेक शंकर और लक्ष्मी सभी ने अपने किरदार ईमानदारी से निभाए हैं।

गीत-संगीत व निर्देशन – निर्देशक कामाख्या नारायण सिंह ने फिल्म को पिछली फ़िल्म से अलग दिखाने का प्रयास किया हैं। इसमें सत्य घटनाओं से प्रेरित होकर कई दृश्य फिल्माएँ गए हैं। केरल के माता–पिता वाला क्लाइमैक्स स्वाभाविक और दिल को छू जाता है। कई स्थान पर वे तर्क नहीं दे पाई जैसे लिव इन में रहने को तैयार लड़की के पिता पूछते हैं फिर बेटा बच्चे…? पुलिस का माता-पिता के साथ में कोऑपरेट न करना, एक ही समुदाय का बलशाली होना,  एकता पर बल देना जैसी घटनाएँ, अंत में बुलडोज़र कार्रवाई ये सब न्यूज़ चैनल व सोशल मीडिया पर लगातार देखते हैं। वे ये भी नहीं बता पाए की पुलिस इतनी सक्रिय कैसे हुई। तीखे व नुकिले संवाद (मेरा अब्दुल ऐसा नहीं है, मुसलमान कभी-भी नास्तिक नहीं हो सकता और सोलह साल की परवरिश पे 6 महीने का प्यार भारी पड़ गया।) और संजय शर्मा की तेज रफ्तार एडिटिंग दर्शकों को बांध रखने में अवश्य कामयाब हुई हैं। आलोक रंजन, मनोज मुन्तशिर व साहिल के गीत कहानी का अच्छा साथ देते हैं। मनन शाह व सुहास के साथ बेकग्राउंड म्यूजिक इम्प्रेस करता हैं। अभिजीत चौधरी का कैमरा वर्क इसका उजला पक्ष हैं।

कमियाँ – फिल्म ज्यादा ड्रामेटिक है। कई गंभीर दृश्य सरलता से निपटा दिये गए हैं। बीफ खाने वाला दृश्य पॉजिटिव किया जा सकता था। तीनों प्रेमियों की चुप्पी लम्बा समय लेती हैं। समुदाय पर केंद्रीत। लड़की शादीशुदा सलीम के साथ लिव इन में क्यों तैयार हो जाती है।

खूबियां – सभी कलाकारों का उम्दा अभिनय, फिल्म का  बैकग्राउंड म्यूजिक, फ़िल्म विशेषकर लड़कियों को सतर्क करती हैं। पालकों को भी जागृत करती है। कम अवधि की फिल्म। बेजोड़ संवाद व निर्देशन।

संजय एम तराणेकर

(कवि, लेखक व समीक्षक)

इन्दौर-452011 (मध्य प्रदेश)