सोचा कई बार बता दूं वह सारी बातें..
जो दिल में चीख-चीखकर
गूंजती हैं…
मगर हर बार होठों तक आते-आते
ठहर जाते हैं, और कहते हैं..
क्या कहना उन्हें बाहर निकालकर..
हवा लग जाएगी अहसासों को
फिर न रह जाएगी उन शब्दों की अहमियत..
सोचकर छोड़ देती हूं सारे भार…
उन आंखों पर, खामोश होठों पर…
शायद समझ में आ जाए..
अनकही…जैसे अब तक समझते रहे हों।