कविता ; खुशी का रहस्य

आज जोरों की आँधी आई।
फिर हुई बारिश।

नवजात शीतलता ने
खोली आँखें।

लोगों को चैन मिला।
और वहीं

सड़क के किनारे
खड़े वृक्ष से

एक डाली
औधे मुँह गिर गई।

सारे वृक्षों पर
आई थी यह आँधी

फिर क्यों सिर्फ टूटी
यही डाली।

नियति थी उसकी
टूट जाने की

ऐसा कहा लोगों ने।
टूट मैं रोज जाता हूँ

बाहर जाते वक्त
काम करते वक्त

दफ्तर जाते वक्त
बीबी बच्चों के साथ भी मैं

प्राय ; टूटा ही रहता हूँ
पर कौन रोता है ?

मेरे लिए ?
फिर मैं क्यों रोऊं ?

उस डाली के टूटने पर —
मै खुश होकर

यह सोचता हुआ
घर की ओर मुड़ा

कि मेरे प्रतिपल टूटने की कड़ी में
एक और जुड़ा। —

सुबह उसी डाल को
टूटे बिखरे

एक झोपड़ी के चूल्हे में
सुलगते देखा।

बड़ी ग्लानि हुई मन में।
तब समझ आया

टूटने का प्रयोजन।
किसी के आश्रित बनकर

जुड़े रहने की लघुता ,
और टूटकर , बिखकर , अलग होकर परहित हेतु
सर्वस्व त्याग देने की गुरुता।

उपरोक्त साहित्यिक रचनाएँ स्वर्गीय बी एन झा द्वारा लिखित पुस्तक इन्द्रधनुष से ली गई है ।

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