क्रोध –
वैसे तो कभी भी आ सकता है
आता ही है
पर वर्षा के बाद
नहाई सड़क पर
शाम के समय
स्वच्छन्द टहलते हुए
भ्रम होता है मुझे
मृग – मरीचिका का
जब सड़क के बीच
छोटी से खाई के
उपेक्षित पड़ा पानी में
उजले पेंट और चमचमाते जूतों से
सजे संवरे
मेरे पाँव
फच्च से पड़ते हैं।
दुर्योधन सा होता हूँ
क्रोधित में गिरकर।
द्रोपदी सी हंसते हैं
मेरे सभी बंधुवर।
युधिष्टर ने बनवाया
इन्द्रप्रस्थ में मायापुरी
और बनाया था उसे
मय नामक दानव ने
प्रभु ने भी दूतों से
बनवाया जीवन पथ
पर उसके बीच बीच
पानी से भरे हुए
गड्डे भी अनगिनत
ताकी –
भ्रम को पहचान सके
मरीचिका को जान सके
तथाकथित बुद्धिमान मानव
मन हो न मुर्छित
और दृष्टि हो गहरी
न गिरे कोई दुर्योधन
न हंसे कोई द्रौपदी
उपयुक्त हास्य कविताएँ स्वर्गीय बी एन झा द्वारा लिखित पुस्तक इन्द्रधनुष से ली गई है ।
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