कविता ; परिणाम

परमात्मा से डरो
यह सीख हमें

हजारों वर्षो से
इस तरह पिला दी गई है

कि आज का हर इन्सान
इस डर से

रेसिसटेंट हो गया है।
निर्भीक बन गया है।

नई निर्भीकता के जोश में
प्रारम्भ कर दिया है वह

खुदा पर ही आक्रमण करना।
हर जगह

परमात्मा का कत्ल
बड़ी बेरहमी से हो रहा है।

उसके घर का
हो रहा है घेराव

उसके दरवाजे पर
हो रहा है प्रोसेशन

उसके आगे
डिमोन्सट्रेशन हो रहा है।

गोलियाँ चल रही है।
चिनगारियाँ जल रहीं हैं।

और परमात्मा को
कत्ल करने वाला

इन्सान को कहाँ छोड़ेगा ?
इन्सान इसलिए आज

धड़ल्ले मर रहा है।
और जिसकी साँसे बची हैं
वो जिन्दा सड़ रहा है।

उपरोक्त साहित्यिक रचनाएँ स्वर्गीय बी एन झा द्वारा लिखित इन्द्रधनुष पुस्तक से ली गई है ।