कविता – बंगाल खुद को फिर से गढ़ रहा…!

बंगाल की ‘धरती’ आज कुछ और कहती है,
सदियों की ‘चुप्पी’ जैसे अब टूटती रहती है।
इस हवा में घुल रहीं है एक नवद-सी पुकार,
यूं ‘डर के साए’ से निकल रहा है हर विचार।
अब ये शब्द नहीं रुकते होंठों की दीवारों में,
यहाँ सच की गूंज है हर गली-हर बाजारों में।
निडर होकर बढ़ते हैं कदम मतदान की ओर,
जन-जन लिख रहा अपना भविष्य चहूँओर।
93 की गीता भट्टाचार्य भी खड़ी है कतार में,
उनकी आँखों में सपने हैं, विश्वास अपार है।
वो चाहती अब बदलाव, नई सुबह की आस,
जहां ‘न्याय की रोशनी’ हो हर एक के पास।
यह बंगाल आज खुद को फिर से गढ़ रहा है,
हर दिल यहाँ अपने हक के लिए लड़ रहा है।
ये सिर्फ चुनाव नहीं, ये जनता की आवाज है,
एक नए कल के आगाज़ का यहीं अंदाज़ है।
संजय एम तराणेकर
(कवि, लेखक व समीक्षक)