कविता ; पुरातन मोह

इतने साल बीत गए
अभी भी करते हो

अंग्रेजों के शासन का बखान
सुशासन कहके।

बड़े ही गर्व से
या सिर झुकाकर ,

कुछ कुछ पछताकर ,
तंग आकर ,

रोज के भ्रष्टाचार से ,
सरकार के आचार से ,

महंगाई की मार से ,
काला व्यापार से ,

सफेदपोशों के व्यभिचार से ,
तालाबंदी हड़ताल से ,
मिलावट के बाजार से।

पर इनके खिलाफ आती
सुनाई नहीं देती तुम्हें

अनगिनत आवाजें ,
बड़ी – बड़ी लाइने ,

बड़े – बड़े जुलूस।
तुम भी कर रहे थे

लाइन में लगे
जिन्दावाद — जिन्दावाद —-

फिर भी न समझे
आजादी का अर्थ ?

शासित थे कहाँ ?
शासक की विरूदावली मत गाओ।

वो अच्छे थे
ये कहने का हक

कहाँ से मिला तुम्हें ?
जो हो रहा है

वो उन्हीं के फेंके
बीज का वृक्ष है।

बीज और वृक्ष में अन्तर है
वृक्ष देर से कटेगा

बस चेष्टा करो ,
मरेगा।

परेशान होओ
हक है तुम्हें ,

पर तनाव के आलम में
हर प्राचीन को उत्तम व

हर स्वर्गवासी को देव कहने की –
भारतीय परम्परा का
त्याग कर दो।

उपरोक्त व्यंग स्वर्गीय बी एन झा द्वारा लिखित पुस्तक इन्द्रधनुष से ली गई है।

 

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