इतने साल बीत गए
अभी भी करते हो
अंग्रेजों के शासन का बखान
सुशासन कहके।
बड़े ही गर्व से
या सिर झुकाकर ,
कुछ कुछ पछताकर ,
तंग आकर ,
रोज के भ्रष्टाचार से ,
सरकार के आचार से ,
महंगाई की मार से ,
काला व्यापार से ,
सफेदपोशों के व्यभिचार से ,
तालाबंदी हड़ताल से ,
मिलावट के बाजार से।
पर इनके खिलाफ आती
सुनाई नहीं देती तुम्हें
अनगिनत आवाजें ,
बड़ी – बड़ी लाइने ,
बड़े – बड़े जुलूस।
तुम भी कर रहे थे
लाइन में लगे
जिन्दावाद — जिन्दावाद —-
फिर भी न समझे
आजादी का अर्थ ?
शासित थे कहाँ ?
शासक की विरूदावली मत गाओ।
वो अच्छे थे
ये कहने का हक
कहाँ से मिला तुम्हें ?
जो हो रहा है
वो उन्हीं के फेंके
बीज का वृक्ष है।
बीज और वृक्ष में अन्तर है
वृक्ष देर से कटेगा
बस चेष्टा करो ,
मरेगा।
परेशान होओ
हक है तुम्हें ,
पर तनाव के आलम में
हर प्राचीन को उत्तम व
हर स्वर्गवासी को देव कहने की –
भारतीय परम्परा का
त्याग कर दो।
उपरोक्त व्यंग स्वर्गीय बी एन झा द्वारा लिखित पुस्तक इन्द्रधनुष से ली गई है।
https://youtube.com/@vikalpmimansa
https://www.facebook.com/share/1BrB1YsqqF/
