सात साल की उम्र में अपने परिवार का सहारा बना एक बच्चा

 

पूजा पपनेजा।

कभी-कभी जिंदगी में कुछ मुलाकातें ऐसी होती हैं, जो हमारे मन में कई सवाल छोड़ जाती हैं। हाल ही में मेरी मुलाकात जब उस बच्चे से हुई,तो उसकी जिंदगी के बारे में जानने की उत्सुकता मेरे मन में लगातार बनी रही।खैर चलिये अब आपको बताते है मैं उस बच्चे से कैसे मिली ?

मैं जब घर से निकलकर बस स्टैंड जा रही थी। तभी मैंने देखा कि एक छोटा बच्चा सुभाष नगर के बस स्टैंड पर बर्तन धोने का काम कर रहा है। उसके बाद कोई व्यक्ति उसे खाने की चीज देकर जाता है। तभी कोई दूसरा व्यक्ति आकर उससे वह चीज छीन लेता है। फिर उसके बाद वह बच्चा यह सब देकर रोने लगता है।
उसके बाद वह मायूस होकर सुभाष नगर बस स्टैंड से अपने घर के लिये बस पकड़ने लगता है। फिर उसके बाद अचानक मेरी मुलाकात उस बच्चे से वही बस स्टैंड पर होती है। वह बस में जब टिकट लेने लगता है। तभी वह मेरे पास आकर बैठ जाता है। फिर मेरे मन में यह विचार आने लगता है कि मैं उससे बात करुँ।
मैं फिर उससे यूँ ही बात करने लगती हूँ। तभी वह मुझे बताता है कि उसके माता पिता का देहांत हो गया है। उसकी एक छोटी सी बहन है। वह अपने बहन का पालन – पोषण करने के लिये यहाँ काम करता है। उसके साथ उसने मुझे यह भी बताया कि उसके पैसे किसी ने खींच लिये है उससे अपनी छोटी बहन को खाना खिलाना है। लेकिन उसके पास पैसे कम है।
मैं यह सब सुनने के बाद थोड़ा भावुक हो जाती हूँ। और फिर मैं उसकी मदद करने की सोचने लगती हूँ। फिर उसी समय मैं अपने बेग से कुछ पैसे निकालकर उससे दे देती हूँ।

फिर वही पर मुझसे वह एक बात कहता है कि दीदी हम बच्चों को अपनी मदद खुद करनी पड़ती है। हम जैसे बच्चों का कोई सहारा नहीं होता । वही पर मुझे वह यह भी बताता है कि दीदी मैं भी अपने जीवन में पुलिस ऑफिसर बनना चाहता था। लेकिन माता पिता की देहांत की वजह से छोटी बहन की जिम्मेदारी मुझ पर आ गई थी । इसलिये मैंने अपनी बहन का पालन पोषण करने के लिये छोटी – छोटी जगहों पर काम करना शुरू कर दिया था । मेरे घर के किसी रिश्तेदार ने भी मेरा साथ नहीं दिया । समय व हालात ने मुझे वक्त से पहले बड़ा बना दिया। फिर मैं यह सब सुनकर उस बच्चे के बारे में सोचने लगती हूँ कि यह बच्चा कैसे अपनी बहन के साथ सारा दिन अकेले व्यतीत करता होगा। बड़ी – बड़ी परस्थितियों का मुकाबला कैसे करता होगा। उसके बाद मैं तभी सोचती हूँ कि मैं इस पर एक कहानी लिखूँगी।

  •    अविनाश की कहानी।

यह कहानी अविनाश शर्मा की है। वह उत्तम नगर में रहते है उनकी उम्र मात्र 7 साल है। उनकी एक 4 साल की छोटी बहन है। जब वह बहुत छोटे थे तभी उनके माता – पिता का बीमारी की वजह से निधन हो गया था। उसके बाद छोटी सी उम्र में ही उनके ऊपर अपनी छोटी बहन की जिम्मेदारी आ जाती है। वही उनके परिवार में भी कोई उनका साथ देनेवाला भी नहीं होता। ऐसे में जैसे जैसे वक्त आगे बढ़ने लगता है। वह समय से पहले बड़े होने लगते है। अपने घर के हालातों को देखते हुये अपनी बहन की जिम्मेदारी उठाने का विचार करने लगते है। इसके लिये वह छोटी – छोटी जगहों पर काम करना भी शुरू कर देता है। अपनी बहन का पालन पोषण करने के लिये अपनी पढ़ाई को भी छोड़ देता है।
इस कहानी के सार से हमें एक बड़ी सीख मिलती है कि हम सबकों अपने रिश्तों की कद्र करनी चाहिए। लेकिन हम कही न कही अधिकत्तम पैसों के चक्कर में अपने रिश्तों को भूलते जा रहे है। ऐसे में जरूरी है कि हम अपने रिश्ते को समझे। यही आज की युवा पीढ़ी को अविनाश की कहानी से सीखने की जरूरत है।

नोट – अविनाश की जिंदगी की यह कहानी कई सवाल भी खड़े करती है कि आखिर उन बच्चों का सहारा कौन बनता है, जिनके सिर से माता-पिता का साया उठ जाता है? क्या इतनी छोटी उम्र में बच्चों को अपने हालात के भरोसे छोड़ देना चाहिए? और क्या अविनाश जैसे बच्चों को भी अपने सपने पूरे करने का अवसर नहीं मिलना चाहिए?