वैद्यनाथधाम में महाशिवरात्रि व पंचशूल की पूजा

 

भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में झारखण्ड के देवधर जिले में स्थित वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग शामिल है। ऐसा देखा गया है कि विश्व के प्राय; सभी शिव मंदिरो के शीर्ष पर त्रिशूल लगा दिखता है मगर वैद्यनाथधाम परिसर के शिव , पार्वती , लक्ष्मी – नारायण व अन्य सभी मंदिरों के शीर्ष पर पंचशूल लगे है। इसके बारे में कहा जाता है कि रावण पंचशूल से ही अपने राज्य लंका की सुरक्षा करता था। चूंकि वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग को लंका ले जाने के लिए कैलाश से रावण ही लेकर आया था अत; यहां के सभी देवताओ के मंदिरो के उपर पंचशूल लगे हैं।
यहाँ प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि से 2 दिन पूर्व बाबा मंदिर , माँ पार्वती व लक्ष्मी – नारायण के मंदिरो से पंचशूल उतारे जाते है। इस दौरान पंचशूल को स्पर्श करने के लिए भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है। वैद्यनाथधाम परिसर में स्थित अन्य मंदिरों के शीर्ष पर स्थित पंचशूलों को महाशिवरात्रि के कुछ दिनों पूर्व ही उतार लिया जाता है। सभी पंचशूलों को नीचे लाकर महशिवरात्रि से एक दिन पूर्व विशेष रूप से उनकी पूजा की जाती है और तब सभी पंचशूलों को मंदिरों पर यथास्थान स्थापित कर दिया जाता है। इस दौरान बाबा व पार्वती मंदिरों के गठबंधन को हटा दिया जाता है। महाशिवरात्रि के दिन नया गठबंधन किया जाता है। गठबंधन के लाल पवित्र कपड़े को प्राप्त करने के लिए भी भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है। महाशिवरात्रि के दौरान बहुत – से श्रद्वालु सुलतानगंज से कांवड़ में गंगाजल भरकर 105 किलोमीटर पैदल चलकर और बोल बम का जयघोष करते हुए वैद्यनाथधाम पहुंचते है। वैसे तो भक्त देवधर सालों भर पूजा अर्चना के लिये जाते है लेकिन प्रत्येक साल के सावन में तो उसकी छटा ही निराली होती है , तथा भक्तों की भीड़ लाखों की सख्यां में हुजूम के साथ इस प्रकार टूटती है कि पूरे सावन माह प्रशाषनिक अधिकारियों के साथ – साथ मंदिर की देख – रेख करने वाले पधाधिकारियों की सांसे अटकी रहती है कि कहीं कोई अनहोनी न हो जाये लेकिन जहां देवाधिदेव भोले शंकर वास करते हों तो वहां कैसी अव्यवस्था। सारी अव्यस्थाओं को भुलाकर लोग भोले शंकर में लीन हो जाना चाहते है।