मिल के चलो

 

अनन्त बाबू गाड़ी छुटने के डर से दस – पाँच मिनट पहले ही स्टेशन आ जाते थे। और गाड़ी थी कि कभी – कभी उनसे घंटों प्रतीक्षा करवाती। यही उनको खराब लगता था लेकिन कर ही क्या सकते थे। लेकिन उस समय वे अपने आपको जब्त नहीं कर पाते थे। जब गुंडातत्व भैकुम काट कर गाड़ी को जहाँ – तहाँ रोक देते थे और घंटों रोके रखते। भैकुम काटने वाले यह भी नहीं देखते कि गाड़ी में दफ्तर जाने वालों को दफ्तर में लेट हो सकती है , स्कूल कॉलेज जाने वालों लड़को की परीक्षा छूट सकती है , कोर्ट कचहरी वालों का केस खारिज हो सकता है , यात्रा करने वालों का गाड़ी का मेल
छूट सकता है , रोगी अस्पताल पहुँचने के पहले ही दम तोड़ सकते हैं। गाड़ी में चलने वाले पाँच हजार यात्री एक दूसरे का मुँह देखते और नपुंसक क्रोध में बड़बड़ाते। वहीं पर गाड़ी एस्कॉर्ट करने वाले रायफलधारी सिपाही आराम से उस ओर ध्यान न देकर गठरीवालों से पैसे वसुलते रहते। यह उनकी मजबूरी भी है क्योंकि गाड़ी में डिउटी के लिये उन्हें डिउटी बाबू को प्रतिदिन 50 रुपए देना भी होता है।
लब्बे – लुबाव यह कि सब राम भरोसे था। प्रशासन भी चुप। उसको क्या गरज पड़ी है। जनता मरे या जीये।

गाड़ी में बैठे – बैठे लोग बहस में सिर फुटौवल किया करते। एक दिन इसी तरह की बहस छिड़ी और खींच गयी। बहस का सूत्र अपने हाथ में लेते हुये अनन्त बाबू ने कहा कि छोड़िये इन बातों को। एक कहानी सुनिये जो हाल ही में किसी पत्रिका में छपी थी। वातावरण में शांति छा गयी और अनन्त बाबू शुरू हो गये। किस्सा रसाने की कला उनके पास थी और लोग उनके अंदाजे बयां पर फिदा हो गये।
कहानी बहुत दिन पहले की है जब अमेरिका आजादी की लड़ाई लड़ चुका था। वहाँ भी तथाकथित जनतंत्र की स्थापना हो चुकी थी। लेकिन जनता की हालत वही थी जो अपने हिन्दुस्तान की है। सभी अपने – अपने खोल में छुप कर अपनी खैर मनाया करते थे। उसी अमेरिका के एक शहर में लुटेरों के एक गिरोह का आंतक छाया हुआ था। लुटेरे जब भी शहर में प्रवेश करते लोग अपने – अपने घरों में छुप जाया करते। दूकानदार अपनी दूकानें बंद कर दिया करते। लुटेरे बगैर किसी प्रतिरोध के लूट – पाट करके चल देते। हत्या उनके लिये मामूली बात थी। पुलिस चुपचाप देखती रहती।
एक दिन ऐसे ही लुटेरे शहर में आये। दूकान फटाफट बंद हो गई। लेकिन एक दूकान गलती से खुली रह गयी। हुआ ऐसा कि दूकान की सेल्स गर्ल का प्रेमी दूकान में खरीद कम रहा था प्रेमिका को निहार ज्यादा रहा था। प्रेमिका भी सामान कम दिखा रही थी प्रेमी को ज्यादा निहार रही थी। इसी देखा – देखी में , उन्हें लुटेरों का आने का पता नहीं चला। और जब तक पता चलता और दूकान बंद होती तब तक लुटेरों की कार्रवाई शुरू हो चुकी थी। इत्तफाकन लुटेरों के सरदार का लड़का उसी दूकान में आ गया। वह सामान लुटने से ज्यादा सेल्स गर्ल में दिलचस्पी लेने लगा। लुटेरे की हरकत सेल्स गर्ल के प्रेमी को अच्छा नहीं लग रहा था। कुछ देर तक तो उसने बर्दास्त किया लेकिन छेड़ – छाड़ की हरकत बढ़ने लगी तो वह अपना गुस्सा जब्त नहीं कर सका। वह उत्तेजित हो गया। वैसे वह निहायत डरपोक किस्म का आदमी था लेकिन प्रेमिका की बेइज्जती ने उसे विवेकहीन बना दिया। उसने न आव देखा और न ताव , दूकान से ही लोहे का रॉड निकाल कर सरदार के बेटे पर वार कर दिया। सरदार का बेटा अप्रत्याशित वार झेल नहीं सका और वहीं दूकान में गिरकर छटपटाने लगा। सरदार के बेटे का गिरने , लुटेरों ने भी देखा , और खिड़की और दरवाजे के फांक से छिपे हुये दुकानदारों एवं गली के निवासियों ने भी देखा। लुटेरे तो स्तब्ध रह गये लेकिन दुकानदारों और गली के निवासियों ने जोश भर गया। उन्हें लगा कि लुटेरे अजेय नहीं है। जब तक लुटेरे लड़के पर हमला करते तब तक सारे निवासी और दुकानदार जो हथियार हाथ लगा लेकर घर से निकल पड़े। कहना न होगा कि लुटेरे भाग गये। उसके बाद लुटेरे उस शहर की ओर कभी भी रूख नहीं किये। इस तरह एक डरपोक व्यक्ति की कार्रवाई ने सारे लोगों में अन्याय के खिलाफ लड़ने की प्रेरणा दे दी।
अनन्त बाबू ने श्रोताओं की ओर मुड़कर पूछा कि कहानी कैसी लगी। सारे लोग किसी से नज़र नहीं मिला रहे थे। पूरा रास्ता चुप्पी में कटी।

उपर्युक्त यह कहानी परत – दर – परत पुस्तक लेखक सिद्वेश्वर नाथ पांडेय के द्वारा लिखी गई है। यह विकल्प – मीमांसा के संपादकीय सलाहकार भी रहे है। अब वह दिवंगत है।