राजनीति की पढ़ाई

 

एक राजा था। उसके चार बेटे थे। चारों पढ़ने में कम गुनने में ज्यादा समय बिताया करते थे। बच्चों के रंग – ढंग देखकर राजा रात दिन चिन्ता में रहने लगे कि उनके मरने के बाद इन मूर्खो से राजकाज कैसे चल पायेगा ? अंत में उन्होंने ढिंढोरा पिटवाया कि जो कोई उनके मूर्ख बेटों को पढ़ा देगा उसे उचित इनाम देंगे। उनकी मुनादी पर एक गरीब ब्राह्मण आया। उसने राजा से कहा कि वह आपके लड़कों को दो वर्षो में पढ़ा देगा। राजा खुश हुये और लड़कों को ब्राह्मण के हवाले लगा दिया।

ब्राह्मण चारो लड़कों को अपने आश्रम में ले गया और एक को गाय की देखभाल पर , दूसरे को ईंधन लाने के लिये , तीसरे को गायों को चराने पर और चौथे को चारा लाने के काम पर लगा दिया। एक साल के बाद उन्हें पढ़ाना शुरू कर दिया।
दो साल बीतने पर ब्राह्मण चारों लड़कों को लेकर राजभवन पहुंचा और राजा से कहा कि वे राजकुमारों की परीक्षा लें लें।

राजा ने प्रश्न किया कि बिच्छू काट ले तो क्या करना चाहिये। एक ने कहा कि वैध बुलाना चाहिये , दूसरे ने ओझा बुलाने की बात की , तीसरे ने डंकवाले स्थान पर चीरा लगाने की बात की और चौथे ने कहा कि आँख में मिर्च की बुकनी डाल देनी चाहिये। चौथे के जवाब पर राजा चौंके और पूछा कि फायदा।
चौथे ने कहा कि बिच्छू का दर्द मिट जायेगा।
कैसे ? राजा ने पूछा।
चौथे ने कहा कि आँख में इतना दर्द हो जायेगा कि बिच्छू काटने का दर्द वह भूल जायेगा।
राजा ने चिंतामग्न होकर दूसरा प्रश्न किया। राजकोष में कोष की कमी हो जाय तो क्या करना चाहिये ?

पहले ने कहा कि कर बढ़ा देना चाहिये , दूसरे ने कहा कि राज्य की फजूल खर्चो को बंद करनी चाहिये। तीसरे ने कहा कि सेना पर खर्च कम
कर देना चाहिये , चौथे ने कहा कि कर की मात्रा बढ़ा देनी चाहिये।
जनता में आक्रोश हो तो , राजा ने पूछा। जनता का रुख देखकर कर में छूट कमी करने की घोषणा कर देनी चाहिये। जनता फिर भी न माने तो। राज्य भर में अपने एजेन्ट भेज कर साम्प्रदायिक , जातीय या विखडंंनतावादी आन्दोलन शुरू कर देना चाहिये।
जनता उन्हीं दंगों में उलझ कर रह जायेगी। करवृद्धि की ओर किसी का ध्यान नहीं जायेगा। कहना न होगा राजा ने चौथे को ही अपना उतराधिकारी बनाया।

उपर्युक्त कहानी विकल्प मीमांसा के संपादकीय सलाहकार रहे सिद्वेश्वर नाथ पांडेय द्वारा लिखी गई है। अब वह दिवंगत हैं।