इस मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा है। पौराणिक कथा के अनुसार एक बार इस स्थान पर भ्रमण करते हुए गुरू द्रोणाचार्य आये थे।
आदिकाल में भोले शंकर ने यहां देवेश्वर के रूप में दर्शन दिये थे। इस मंदिर के शिवलिंग पर एक चट्टान से पानी की बूंदे टपकती रहती हैं। गुफा में शिवलिंग के ऊपर लगातार पानी की बूंदे टपकने के कारण इस मंदिर का नाम टपकेश्वर पड़ा। इस प्राचीन मंदिर के बारे में और जानकारी देते हुए मंदिर के पुजारी ने बताया कि पहले इस गुफा और आस-पास घना जंगल हुआ करता था।
जब गुरू द्रोणाचार्य ने तपस्या की तब खुश होकर भगवान शिव ने उन्हें दिये। द्रोणाचार्य के आग्रह करने पर भगवान शिव यहां लिंग के रूप में स्थापित हुए। इसी गुफा में द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा का भी जन्म हुआ। बेटे के जन्म के बाद उनकी मां दूध नहीं पिला पा रही थी। उनकी मां चावल का मांड़ रखकर पिलाती थी।
एक दिन अश्वत्थामा ने अपनी उम्र के बच्चों को देखा वह अपनी मां का दूध पी रहे थे, उन्होंने अपनी मां से यह पूछा। उनकी मां ने कहा – जिस प्रकार आपके पिता ने तपस्या के बाद आपको प्राप्त किया उसी प्रकार आप भी तपस्या करो, आपको भी दूध की प्राप्ति होगी।
उन्होंने भोलेनाथ से प्रार्थना की, जिसके बाद भगवान शिव ने गुफा की छत पर गऊ थन बना दिये और दूध की धारा शिवलिंग पर बहने लगी। कलियुग में इस धारा ने पानी का रूप ले लिया। जिसके कारण इसका नाम टपकेश्वर पड़ा।
पंडित जी ने यह भी बताया कि देहरादून को पहले द्रोण नगरी के नाम पंडित जी ने यह भी बताया कि देहरादून को पहले द्रोण नगरी के नाम से जाना जाता था, लोगों के डेरा डालने के बाद इसका नाम देहरादून पड़ा।
सावन में यहां मेला लगता है। ऐसी मान्यता है कि सावन महीने में यहां शिवलिंग पर जल चढ़ाने से भक्तों की मनोकामना पूरी हो जाती है। टपकेश्वर मंदिर में देश ही नहीं विदेशों से भी श्रद्धालु आते हैं। देहरादून आने वाले लोग अपनी मनोकामनाएं पूर्ण होने की आस में इस मंदिर का दर्शन करने जरूर आते हैं।