दशहरे पर रावण दहन क्यों किया जाता है? जानिये इसकी खास वजह ?

मीमांसा डेस्क।

सनातन धर्म में मनाए जाने वाले प्रमुख त्योहारों में दशहरा का पर्व बेहद खास है। यह पर्व असत्य पर सत्य की और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। आश्विन महीने के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाए जाने वाले इस त्योहार पर देश भर में बड़े-बड़े मेले लगते हैं और रावण, कुंभकर्ण तथा मेघनाद के ऊंचे-ऊंचे पुतले जलाए जाते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हर साल दशहरे के दिन रावण का पुतला क्यों जलाया जाता है? आइए जानते हैं इसके पीछे की पौराणिक कथा क्या है?

  •   रावण दहन की पौराणिक कथा क्या है ?

पौराणिक कथा के अनुसार, लंका का राजा रावण बहुत ही ज्ञानी और महाशक्तिशाली था, लेकिन उसके अंदर घमंड और अधर्म कूट-कूट कर भरा था। रावण ने छलपूर्वक माता सीता का अपहरण कर लिया था, जिसके बाद भगवान श्री राम और रावण के बीच भयानक युद्ध हुआ। भगवान राम ने अपनी वानर सेना और भाई लक्ष्मण के साथ लंका पहुंचे। यह युद्ध कई दिनों तक चला, जिसमें रावण के भाई कुंभकर्ण और पुत्र मेघनाद सहित पूरी राक्षसी सेना का नाश हो गया।

आखिरकार, आश्विन महीने की दशमी तिथि को भगवान श्री राम ने रावण का वध किया और माता सीता को उसकी कैद से मुक्त कराया। तभी से भगवान राम की इस विजय की खुशी में हर साल विजयदशमी का पर्व मनाया जाता है और रावण का पुतला दहन किया जाता है।

  •    रावण दहन क्यों किया जाता है ?
  •  अहंकार और घमंड का अंत: रावण के पास अपार शक्ति, अपार धन-दौलत और 6 शास्त्रों का ज्ञान था, लेकिन उसे अपनी ताकत पर बहुत अहंकार था। रावण दहन हमें यह सिखाता है कि अहंकार चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसका नाश हमेशा निश्चित होता है।
  • बुराई पर अच्छाई की जीत: यह पर्व इस बात का उदाहरण है कि अधर्म और पाप का रास्ता चाहे कितना भी मजबूत लगे, अंत में विजय हमेशा सत्य, धर्म और न्याय की ही होती है।
  • मन के रावण का अंत: रावण के 10 सिर काम, क्रोध, लोभ, मोह, घमंड, ईर्ष्या, स्वार्थ, अन्याय अहंकार के प्रतीक हैं। ऐसे में इस दिन बाहर के रावण को जलाने के साथ-साथ अपने अंदर से इन 10 बुराइयों को भी खत्म करने का संकल्प लेना चाहिए।
  •    बच्चों और नई पीढ़ी को शिक्षा
    हर साल रावण दहन करने का एक उद्देश्य यह भी है कि आने वाली पीढ़ी रामायण की कथा और उसके आदर्शों से जुड़ी रहे। जब बच्चे रावण दहन देखते हैं तो वे यह समझते हैं कि जीवन में अहंकार और बुराई से दूर रहना चाहिए और भगवान राम जैसे आदर्शों का पालन करना चाहिए।
  • धार्मिक आस्था और परंपरा
    दशहरा पर्व का महत्व केवल ऐतिहासिक या सांस्कृतिक नहीं, बल्कि धार्मिक भी है। यह दिन देवी दुर्गा की महिषासुर पर विजय के साथ भी जुड़ा हुआ है। इस प्रकार रावण दहन दोहरी जीत का प्रतीक बन जाता है।
  • रावण दहन की परंपरा की शुरुआत कैसे हुई थी ?

वर्तमान समय में देशभर में कई जगहों पर रामलीला का आयोजन किया जाता है। इसके साथ ही रावण दहन भी किया जाता है। भारत देश के आजाद होने के बाद रावण दहन की शुरुआत झारखंड के रांची से हुई थी।वैसे रावण दहन की शुरुआत साल 1948 में की गई थी। साल 1947 में भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के बाद पाकिस्तान से विस्थापित होकर आए शरणार्थियों ने झारखंड के रांची शहर में दशहरे का आयोजन करके रावण दहन किया था।

  •   रामलीला आयोजन की शुरुआत

रामलीला के मंचन की शुरुआत 16वीं-17वीं शताब्दी से मानी जाती है। गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरित मानस-रामायण के बाद से उत्तर भारत में रामलीला मंचन की शुरुआत हुई। हालांकि, दशहरे के दिन रावण का पुलता जलाने की परंपरा काफी बाद में शुरू हुई। प्राचीन समय में मिट्टी या लकड़ी से बने रावण के पुतले जलाने की परंपरा थी। घास-फूस, कागज और पटाखों से विशाल पुतले जलाने की शुरुआत काफी बाद में हुई। अब देशभर में कई जगहों पर 100 फीट से भी अधिक ऊंचे रावण के पुतले बनाकर जलाए जाते हैं।

नोट – यह आर्टिकल केवल जागरूकता के लिये है। इस आर्टिकल का उद्देश्य किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है।