आशुतोष बाबू सारे जहाँ का दर्द अपने जिगर में समेट कर रखने की आदत से लाचार हैं। समझाओ तो थोड़ी देर मुंड हिला देंगे फिर वही ढ़ाक के तीन पात। उनके शुभेच्छुओ ने भी अब टोकना और समझाना बंद कर दिया है।
आशुतोष बाबू जिस दफ्तर में काम करते हैं वहाँ सूद का धंधा करने वाले लोग भी हैं। गरजमंद कर्मचारियों को 5 से लेकर 15 प्रतिशत प्रतिमाह की दर से सूद पर कर्ज दिया करते हैं। और जो भी कर्मचारी इनके चंगुल में जाता है उसका उबरना मुश्किल हो जाता है। किसी – किसी कर्मचारी का सारा का सारा वेतन सूद में सूदवाले रख लेते हैं ।
एक बेचारे ने लड़की की बीमारी में तीन हजार रूपये सूद कर लिया। तीन वर्ष में वह मूल से तिगुना पैसा लौटा दिया लेकिन मूल ज्यों का त्यों बरकरार। दूसरे ने लड़की की शादी में पैसा लिया। सूद में सारा वेतन सूदखोर ले लेते थे। परिणाम हुआ वह भूखों मर गया।
आशुतोष बाबू यह सब देखकर चुप थे क्योंकि उनका कुछ भी वश नहीं चलता था। सूद पर कर्ज लेने वालों को समझाते थे। लेकिन कम वेतन भोगी को वगैर सूद पर पैसा लिये काम चलता न था। अन्त में , आशुतोष बाबू थेथरई पर उतर गये। उन्होंने एक सज्जन को , जो दफ्तर में समय के पाबन्द और कदाचार से हमेशे अलग रहते थे , समझाना शुरू किया। सज्जन स्वयं सूद पर पैसा नहीं लगाते , बल्कि सूद का धंधा करने वालो को 2 प्रतिशत सूद की दर से पैसा देते थे। और वह इस पैसे से सूद का काम करता था।
एक दिन समझाने के क्रम में हीं उन्होंने आशुतोष बाबू से कहा कि आशुतोष बाबू ,, अगर सूद का धंधा खराब है तो आप बैंक से सूद क्यों लेते हैं।
सवाल इतना टेढ़ा था कि कुछ देर तक उनको जवाब ही नहीं जुटा। थोड़ी देर सोचने के बाद धीरे – से कहा , भाई प्रकृति में आदमी दो ही रूप से आता है। एक नर के रूप में और दूसरा मादा के रूप में।
नर और मादा में स्वाभाविक आकर्षण होता है। फिर भी हमने अपने विवेक से सामाजिक मान्यता बना रखी है कि वही मादा कहीं माँ है , कहीं बहिन है , कही बेटी है और कहीं पत्नी है। सारी औरतजाद से हम वह संबंध नहीं रखते जो पत्नी से रखते हैं।
क्योंकि सामाजिक मर्यादा हमारे आड़े आती है। और वही मर्यादा जानवरों में नहीं है इसीलिए उनके बीच सिर्फ एक ही रिश्ता काम करता है वह है नर और मादा का।
ठीक उसी तरह से बैंक का सूद भी है। सामाजिक मर्यादा बैंक की सूद को मिल गया है इसीलिए उसे हम सही मानते हैं और दूसरे सूद को सामाजिक मर्यादा नहीं मिली है इसलिए हम गलत मानते हैं।
उपर्युक्त यह कहानी परत – दर – परत पुस्तक लेखक सिद्वेश्वर नाथ पांडेय के द्वारा लिखी गई है। यह विकल्प – मीमांसा के संपादकीय सलाहकार भी रहे है। अब वह दिवंगत है।