ग़ज़ल

 

जब मुझे रिश्तों की धूप छाँव में जीना पड़ा ,
हर मोड़ पर किसी न किसी को खोना पड़ा।

उम्र भर जिस पर किया इस दिल ने ,भरोसा
यूं मुझे उस शख़्स से ही दर्द भी सहना पड़ा।

वो पास आकर भी मेरे दिल से बहुत दूर था ,
मुझे उन्ही खामोशियों का बोझ उठाना पड़ा।

आज भी उनकी आँखों में कुछ नमी तो थी ,
लेकिन मुझे उसको हँसाकर ही जाना पड़ा।

मैं हर बार टूटकर जाने कैसे संभलता रहा हूँ ,
क्यों मुझे पत्थर के इस शहर में रहना पड़ा।

कुछ लोग साथ थे तो सफर आसान लगा था ,
मुझे अब तन्हाईयों को भी दोस्त बनाना पड़ा।

रिश्ता अगर वफ़ा का हो तो दिल से निभाइए ,
मुझे इस तरह क्यों ? कर यूं उम्रभर रोना पड़ा।

उपर्युक्त पक्तियां लेखक संजय एम तराणेकर द्वारा लिखी गई है।