अब कहीं प्रधानमंत्री, “चीनी” पर फरमान न दे दें,
बढ़ते दामों से जनता को, कोई नव ज्ञान न दे दें।
कहें-मीठा कम कीजिए, “स्वास्थ्य” का रखें ध्यान,
चीनी महँगी हुई तो क्या, देशहित में है बलिदान!
चाय में चीनी कम होगी, हलवाई “मिठास” घटेगी,
गरीब की थाली वैसे, अभी थोड़ी और सिमटेगी।
दाम बढ़े तो भाषण आए, महँगाई पे ज्ञान मिलेगा,
प्रजा पूछे-“चीनी सस्ती?” उत्तर में ध्यान मिलेगा!
कल तेल बचाने बोले, अब चीनी बचाने की बारी,
महँगाई की पाठशाला में, जनता बन रहीं बेचारी।
ये तंत्र कहे-“कम मीठा खाओ, सेहत ठीक रखो।”
जन बोले-“ठीक साब, पहले जेब की सेहत रखो!”
चीनी के दाम बढ़ जाएँ, हिम्मत अपनी मत हारो,
मीठे वादों की मिठास छोड़, सच स्वाद स्वीकारो।
यूं बाजार की दुनिया में, एक बात समझ में आई,
चीनी चाहे महँगी हो, महँगाई ज्यादा कड़वी भाई!
संजय एम तराणेकर (कवि, लेखक व समीक्षक)