मीमांसा डेस्क
नवरात्रि का पर्व आते ही देशभर में भक्ति और उत्साह का माहौल दिखाई देने लगता है। मंदिरों में मां दुर्गा की पूजा-अर्चना होती है, तो वहीं गुजरात सहित देश के कई हिस्सों में गरबा की धूम देखने को मिलती है। रंग-बिरंगे पारंपरिक कपड़े, ढोल की थाप, लोकगीत और गोल घेरे में नृत्य करते लोग इस उत्सव को खास बना देते हैं। नवरात्रि में खेले जाने वाले गरबा और डांडिया के बिना नवरात्रि का त्योहार अधूरा माना जाता है। आखिर इसका इतना महत्व नवरात्रि में क्यों होता है। इसके बारे में हम आपको बताते है।
- नवरात्रि में गरबा खेलना इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है ?
नवरात्रि का पर्व आते ही त्यौहारी सीजन की शुरुआत हो जाती है। इन दिनों से ही लोग घरों को तो सजाते ही है साथ ही अपना लाइफस्टाइल भी ट्रेडिशनल लुक में बदल लेते हैं। इस दौरान नवरात्रि में गरबा खेलने का ट्रेंड हर किसी के चेहरे पर साफ नजर आता है। इसके लिए लोग हफ्तों पहले तैयारी करने में भी लग जाते हैं।
रंग-बिरंगे कपड़ों से लेकर गरबा नाइट में डांस करने तक की तैयारियां करना भी शुरू कर देते हैं। बहुत से लोग तो ऐसे भी हैं जो नवरात्रि का इंतजार ही सिर्फ इसलिए करते हैं क्योंकि इस दौरान उन्हें गरबा खेलने, रंग-बिरंगे कपड़े पहनने का मौका मिलेगा। वैसे तो गरबा और डांडिया खेलने की परंपरा काफी सालों पुरानी है।
वही नवरात्र के 9 दिन मां को प्रसन्न करने के लिये गरबा खेला जाता है। शास्त्रों के अनुसार नृत्य को साधना का एक रास्ता बताया गया है। गरबा के माध्यम से मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए देशभर में इसका आयोजन किया जाता है। इस दिन लोग रात्रि में धूमधाम से गरबा खेलते है।
वही गरबा’ के बारे में आपसे खास चर्चा करे तो गरबा’ को तीन रूपों में वर्णित किया गया है। जैसे – गरबा’ का असली मतलब- गर्भ दीप है। तीन तालियों का रहस्य- गरबा नृत्य के दौरान महिलाएं 3 तालियों का प्रयोग करती हैं। ये 3 तालियां इस पूरे ब्रह्मांड के त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश को समर्पित होती हैं। इन 3 तालियों की ध्वनि से जो तेज प्रकट होता है और तरंगें उत्पन्न होती हैं, उससे शक्ति स्वरूपा मां अंबा जागृत होती हैं। यही है नवरात्रि में गरबा खेलने की असली वजह यानी ये भी एक तरह से माता की भक्ति प्रकट करने का तरीका भी है।
गरबा नृत्य में महिलाएं ताली, चुटकी, डांडिया और मंजीरों का भी प्रयोग करती हैं। ताल देने के लिए महिलाएं दो या फिर चार के समूह में विभिन्न प्रकार से ताल देती हैं। इस दौरान देवी शक्ति और कृष्ण की रासलीला से संबंधित गीत भी गाए जाते हैं।
गरबा का महत्व केवल धार्मिक ना होकर इसे राजनीति और साहित्य के साथ भी जोड़ा गया है। आजादी से पहले गुजरात में नवाबों का राज था, उस समय गरबा केवल गुजरात की ही शान हुआ करता था। परंतु आजादी के बाद जब गुजरात के लोग अपने प्रदेश से बाहर निकले और अन्य स्थानों को अपना निवास बनाया तब धीरे-धीरे गरबा अन्य स्थानों पर भी आयोजित किया जाने लगा।
- गरबा का मां दुर्गा से क्या संबंध है? इसके पीछे की क्या कहानी है ?
इसे लेकर एक पौराणिक कहानी भी है, जिसके अनुसार महिषासुर ने जब स्वर्ग सहित संसार में त्राहिमाम मचा दिया था तब देव और मानव सभी भय से मुक्ति के लिए श्री हरि विष्णु की शरण में गए। तब ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने अपनी शक्तियों को मिलाकर एक परम शक्ति को अवतरित किया और दुर्गा का अवतार हुआ। मैया ने लगातार नौ दिन महिषासुर से युद्ध किया और युद्ध के दौरान मैया एक विशिष्ट क्रोध मुद्रा में रण में इधर-उधर चल रही थी जो एक नृत्य सा प्रतीत हो रहा था। आगे चलकर महिषासुर मर्दिनी मैया के सम्मान में गरबा का प्रचलन इसी नाच के रूप में होने लगा।
- गरबा रास का क्या है संदेश?
गरबा और रास केवल नृत्य नहीं हैं, बल्कि ये भक्ति, सामूहिकता और भारतीय सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक भी हैं। नवरात्रि में लोग एक साथ आकर मां दुर्गा की आराधना तो करते ही है। इसे भक्ति प्रकट करने का एक तरीका भी माना जाता है। वहीं रास नृत्य भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति परंपरा की याद दिलाता है।यही कारण है कि हर साल नवरात्रि के दौरान गरबा और डांडिया का आयोजन लोगों को धर्म, संस्कृति और परंपरा से जोड़ते हैं।
नोट – यह आर्टिकल केवल जागरूकता के लिये है इसका संबंध किसी की भी धार्मिक भावनाओं को आहत पहुँचाना नहीं है।


