अखबारी नेता

 

लोकल गाड़ियों में अमूमन ऐसी भीड़ होती है कि गाड़ी में बैठने की बात कौन करे , खड़ा रहने की भी जगह नहीं मिलती। यात्रियों से खचाखच भरे रहने के बावजूद स्टेशन पर की खड़ी भीड़ गाड़ी में वैसे ही समा जाती है जैसे मक्खन से लबालब भरे प्याले में मिश्री।
ऐसी ही गाड़ियों से आशुतोष बाबू डेली – पैसेन्जरी किया करते हैं। एक दिन गाड़ी में चढ़ते ही उन्होंने जगह की तलाश में इधर – उधर नजर दौड़ायी। एक बर्थ दिखाई दिया जिस पर एक अकेला व्यक्ति लेटा था। वे उधर ही लपके।

वहाँ जाकर लेटे हुये व्यक्ति से बैठने की इजाजत चाही। लेटे हुये व्यक्ति ने बड़े ही क्षीण स्वर में तबियत खराब होने की बात कही। वे ठमक कर रह गये। उस बर्थ के ठीक सामने वाले बर्थ पर बैठे सज्जन ने उन्हें हाथ पकड़कर बैठाये हुये कहा कि आशुतोष बाबू जगह दिल में होती है काठ के सीट में नहीं। आशुतोष बाबू बैठ गये।

आशुतोष बाबू बर्थ पर लेटे व्यक्ति से उनकी बीमारी के सम्बन्ध में पूछा। बीमार सज्जन ने बड़े क्षीण स्वर में जवाब दिया कि वे यूनियन की मांगों को लेकर 20 दिनों तक भूख हड़ताल में रहे थे , इसीलिये वे काफी कमजोर हो गये हैं। आशुतोष बाबू ने फिर पूछा कि मांगें मिली।
कुछ मिली हैं और कुछ बाकी है ,, बर्थ वाले सज्जन ने जवाब दिया।

आशुतोष बाबू ने फिर पूछा कि उनका संगठन किस राष्ट्रीय संगठन से संबंद्ध है।
बर्थवाले सज्जन ने जवाब दिया कि दरअसल बात ऐसी है कि जितने भी संगठन है वे सब मज़दूरों का शोषण करते हैं , इसीलिये किसी भी यूनियन से हम सबंद्ध नहीं हुये हैं।

आशुतोष बाबू ने तुरंत कहा कि इसका क्या सबूत है कि आप मज़दूरों का शोषण नहीं करते हैं या अभी नहीं करते है तो भविष्य में भी नहीं करेंगे।

बर्थ वाले सज्जन की बोलती बन्द हो गई। उन्होंने आशुतोष बाबू की ओर से करवट फेर लिया। आशुतोष बाबू ने फिर कहा कि मौजूद व्यवस्था में परिवर्त्तन लाये वगैर मजदूरों का शोषण बंद नहीं हो सकता है। इसलिये व्यवस्था परिवर्त्तन के लिये मजदूरों को स्वयं उठना होगा। उस परिवर्त्तन की लड़ाई आप अकेले कर लेंगे क्या ?

लेकिन बर्थ वाले सज्जन फिर भी चुप ही रहे। तब तक आशुतोष बाबू के बगल में मैली सी धोती कुर्त्ता पहने हुये सज्जन ने कहा कि आशुतोष बाबू एक कहानी सुनिये। हांग – कांग के एक करोड़पति व्यापारी से , कुछ लोगों ने पूछा कि आपका बेटा होकर भी वह तस्करी क्यों करता है ? क्या कमी है उसको ? व्यापारी ने जवाब दिया कि मेरा बेटा जवानी में ही करोड़पति बनना चाहता है।

लगभग यही हाल श्रीमान जी का भी है। बड़े संगठन में शामिल होने पर इनकी व्यक्तिगत पहचान बनते – बनते बनेगी। अलग – थलग रहेंगे तो अखबार में इनका रोज बयान निकलेगा और कुछ ही दिन में अखबारी महान नेता बन जायेंगे। अरे आशुतोष बाबू ये लोग मजदूरों के लिये नहीं , अपितु अपने लिये ट्रेंड यूनियन चलाते हैं। इन्हें मज़दूरों से क्या मतलब ?

उपर्युक्त कहानी विकल्प मीमांसा के संपादकीय सलाहकार रहे सिद्वेश्वर नाथ पांडेय द्वारा लिखी गई है। अब वह दिवंगत हैं।