मेनोपॉज के बारे में अब जितनी बातें होने लगी हैं, पहले शायद ही होती थी। आज भी सुदूर गांवों में इसके बारे में महिलाएं अनजान हैं, और इसकी पीड़ा को आम समझकर झेल रही हैं। इसका एक प्रमुख कारण महिलाओं के शरीर को लेकर बनती रही आम धारणा है कि सब पर्दे की बातें हैं। 12 से 13 की उम्र में माहवारी शुरू होने के बाद से ही उसे पर्दे, लोक लाज और धार्मिक अनुष्ठानों में अनुपस्थिति से जोड़ दिया जाता है।
बचपन से किशोरावस्था में किसी लड़की का प्रवेश उसी समय हो जाता है, जब उसे पहली बार माहवारी आती है। हालांकि वह समय किसी भी बच्ची के लिये डरावना ही होता है कि वह अपने शरीर के हिस्से से लाल रक्त को अचानक बहते देखती है। उस समय बच्ची की मां व उसके नजदीकी रिश्तेदार इस परिस्थिति से अवगत कराते हुए समझाते हैं, कि ऐसा हर महीने के चार दिन होगा, सभी लड़कियों व महिलाओं के साथ होता है।
मां के साथ भी हुआ था, दादी, चाची सब इस दौर से गुजरे हैं। बच्ची फिर अपने शरीर के बदलाव को समझ जाती है। इसके साथ ही उसे उस चार दिन के पीरियड अर्थात माहवारी में होने वाले दर्द और बेचैनी को भी सहना पड़ता है। धीरे-धीरे वह बच्ची किशोरी से युवती बनने की प्रक्रिया में स्कूल, कॉलेज और कार्यस्थल पर स्वयं को संतुलित रखना सीख जाती है। इस दौरान उसके मासिक दर्द को समझने वाले और बातें करने वाले नगण्य होते हैं। वर्षों के इस दर्द को सहते हुए 40 से 45 की उम्र के बीच जब महिला बच्चों एवं घर की जिम्मेदारी को संभालते हुए चुनौतियों के शीर्ष पर होती हैं, तब एक और पड़ाव दस्तक देने के लिये तैयार होता है, और वह है मेनोपॉज यानि रजोनिवृति।
मेनोपॉज क्या है?
रजोनिवृति यानि किसी महिला के जीवन में माहवारी का खत्म होना होता है। लेकिन यह बहुत आसानी से नहीं होता, बल्कि कई बदलाव लेकर आता है। इसे ऐसे समझते हैं- जैसे लड़की अपने जीवन में पहली माहवारी से अनजान होती है, उसी तरह अंतिम माहवारी की प्रक्रिया भी महिला के जीवन को प्रभावित करती है। वर्षों से एक ढ़र्रे पर चल रहे जीवन में अचानक परिवर्तन होना अधिकांश महिलाओं की शख्सियत को परेशान करता है। जीवन और अपने शरीर में चल रहे उथल पुथल से जैसे दुनिया वीरान लगने लगती है। स्वंय पर खीज, दूसरों पर झल्लाहट उस दौरान ऐसे भाव उत्पन्न होते हैं, जिन्हें समझना और समझाना किसी के लिये भी आसान नहीं होता है। चिकित्सीय भाषा में समझने से पहले उन महिलाओं के दैनिक बदलाव को समझें तो अधिक आसानी होगी। इसे एक घटना से समझते हैं।
जानकारी की कमी
साल 2014 में एक बार मेरी एक रिश्तेदार दिल्ली आईं। उन्हें हैवी ब्लिडिंग की समस्या आ रही थी, जो पिछले कई महीनों से थी। हर महीने दस से पन्द्रह दिन पीरियड का दर्द और तीव्र रक्तस्राव के कारण उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा था। गंगाराम में दिखाया, वहां उनकी छोटी सी सर्जरी की गई। तत्काल आराम होने पर वह वापस घर लौट गईं। हमें लगा, इलाज हो गया अब सब कुछ सामान्य है, मगर कुछ समय बाद फिर से पुरानी समस्या होने लगी। पटना में डॉक्टर को दिखाया तो स्थायी इलाज के नाम पर यूट्रस यानि बच्चादानी निकाल दिया गया। अब पीरियड की नो झंझट। लेकिन क्या यूट्रस निकालना ही इसका एकमात्र इलाज था? क्या परेशानी के दौरान सभी डॉक्टर ने उनका उचित इलाज किया?
शायद नहीं। दिल्ली की एक स्त्री रोग विशेषज्ञ के अनुसार बिहार में एक घटना बार-बार सामने आती है कि महिलाओं में अगर माहवारी की अनियमितता हो, अधिक रक्तस्राव अधिक दिनों तक हो या कुछ ऐसी ही समस्या आये तब एक इलाज तुरंत सामने नजर आता है और वह है, बच्चादानी को ही हटा देना। जबकि इस प्रक्रिया से महिला के विभिन्न अंगों के साथ दिल की सेहत पर भी काफी असर होता है। इसके बावजूद ज्यादातर डॉक्टर इसकी गंभीरता को नहीं समझते हैं।
खैर..। रिश्तेदार के मुद्दे को इसलिये उठाया क्योंकि उस वक्त जब वह लगभग 45 से 50 की उम्र के बीच थी, तब वह रजोनिवृति की प्रक्रिया से गुजर रही थी। अधिक दिनों तक तेज रक्तस्राव या अनियमित माहवारी को इसलिये नहीं समझ सकीं क्योंकि उन्हें रजोनिवृत्ति या मेनोपॉज के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। इसका एक कारण उन महिलाओं का भी नहीं बोलना है, जिन्होंने इस उम्र की दहलीज को पार कर लिया लेकिन अपने उस बदलाव को उम्र का तकाज़ा समझकर चुप बैठना सही समझा। इसीलिये किसी बच्ची के जीवन में शुरू होने वाली माहवारी के दौरान उसे समझाने के लिये कई ज्ञानी महिलाएं होती हैं, मगर उसके जीवन में अंतिम माहवारी कब तक और कैसे आएगी कोई नहीं समझाता। इसी के फलस्वरूप आज भी कई महिलाओं को मेनोपॉज की कठिन और असहज कर देने वाली प्रक्रिया को चुपचाप सहना पड़ता है, या वह अपने शरीर के महत्वपूर्ण अंग बच्चेदानी को खो देने का खतरा मोल लेती हैं।
ये मेनोपॉज का वक्त है
इस घटना के वर्षों बाद मैने भी अपने शरीर में कुछ इसी तरह के बदलाव को महसूस किया और पाया कि ये मेनोपॉज का वक्त है। एक नियमित पीरियड की प्रक्रिया कब अनियमित होने लगी, 4 दिन कब 8 दिन और 15 दिन में बदलने लगे आभास ही नहीं हुआ। एक दो महीने बाद खून की कमी से शारीरिक दुर्बलता ने इशारा किया कि डॉक्टर को दिखाना जरूरी है। आश्चर्य की बात यही है कि उस वक्त भी डॉक्टर खुलकर नहीं बतलाते कि आपके साथ ऐसा क्यूं हो रहा है। आपको कुछ दवाएं दी जाती हैं, और आप पहले से सहज होते हैं। साल-दो साल इसी तरह बीतते रहते हैं और फिर पीरियड का अनियमित होना शुरू हो जाता है। उस वक्त एक महिला अपने शरीर के बदलावों के रहस्य को नहीं समझ पाती। कुछ समय बाद पीरियड आने का क्रम कम होने लगता है और एक दिन रूक जाता है। फिर आप जब डॉक्टर की ओर रूख करती हैं, तो पता चलता है, आपका मेनोपॉज या रजोनिवृति हो गया। मेनोपॉज से पहले और बाद का समय अधिकांश महिला के लिये सामान्य नहीं होता है। कई मुश्किलें लेकर आता है, जिससे उसके दैनिक कार्य प्रभावित हो सकते हैं।
स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. रानी गुप्ता (आयुर्वेदा) के अनुसार, ये एक प्राकृतिक बदलाव है, जो हर महिला की जिंदगी में आता है। सामान्यतया मेनोपॉज 45 से 55 साल की उम्र के बीच आता है। यह समय 10 सालों का होता है।
मेनोपॉज तक पहुंचने का जो समय होता है, उसे पेरी मेनोपॉज कहते हैं, जो किसी के जीवन में एक साल का तो किसी के जीवन में 4-5 साल का भी हो सकता है। मुख्यरूप से 40 की उम्र के आस-पास ये बदलाव दिखाई देने लगते हैं।
मेनोपॉज के साथ कुछ संशय जुड़े होते हैं, कि महिला मेनोपॉज के समय सेक्सुएलिटी व प्रजनन क्षमता खोने वाली है। कई बार इसे लेकर महिलाओं में नकारात्मकता जन्म लेने लगती है, लेकिन वास्तव में महिलाओं के लिये यह समय दूसरे वसंत की तरह है।
मेनोपॉज के लक्षण और देखभाल
सभी महिलाओं में लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं। आमतौर पर सामान्य लक्षणों में हॉट फ्लश होना, रात में नींद की कमी, जोड़ों में दर्द, बाल गिरना, सूखी त्वचा की समस्या, वजन बढ़ना, मिजाज बदलते रहना, चिड़चिड़ापन, खाने के स्वाद में बदलाव आदि हैं। ये ऐसे लक्षण हैं, जिनसे कुछ महिलाएं जूझती हैं।
जरूरी है कि महिलाएं स्वयं की देखभाल करना सीखें, क्यूंकि खासकर भारतीय महिलाओं में इसकी कमी देखी जाती है। अपनी चिंता करना, अपने लिये कुछ समय निकालकर एक्सरसाईज करना, अपने लिये कुछ खाना बनाना, अपने महत्व को समझना सबसे पहली जरूरत है। किसी भी इलाज से पहले स्वयं की देखभाल को आप नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं। हम शुरूआत सबसे पहले डाइट से कर सकते हैं। हर खाने में उम्र के अनुसार कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, अच्छी मात्रा में फैट, मिनरल्स को शामिल करने की आवश्यकता होती है, जिससे सम्पूर्ण पोषण मिल सके।
मेनोपॉज के दौरान एस्ट्रोजेन कम होता जाता है, जिससे मसल मास लॉस होने लगता है। एस्ट्रोजेन बहुत सारे विटामिन को अवशोषित करने में मदद करता है। शरीर में इसकी कमी होने के चलते परेशानियां बढ़ने लगती हैं। खासकर कैल्शियम और विटामिन डी के लिये बहुत महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में सूर्य की रोशनी, कैल्शियमयुक्त डाइट या फिर बीच-बीच में कैल्शियम सप्लिमेंट भी ले सकते हैं।
कई बार महिलाओं को मेनोपॉज के समय बहुत अधिक ब्लिडिंग होती हैं, लेकिन डॉक्टर तक इस समस्या के साथ पहुंचने में साल-डेढ़ साल का वक्त लग जाता है। इसके कारण क्रोनिक एनिमिया यानि हीमोग्लोबिन या आयरन की कमी होती है। इससे शरीर की ताकत की कमी, बालों का गिरना आदि देखा जाता है। ऐसे में डॉक्टर से मिलकर अपना चेकअप कराएं। हो सकता है, थोड़ी सी जागरूकता और देखभाल से छोटी समस्या को बड़ा बनने से रोका जा सके।
सावधानी
कुछ महिलाओं में मेनोपॉज इतनी समस्या लेकर नहीं आता, तो कईयों में कुछ सामान्य लक्षण दिखते हैं, जिसकी चर्चा ऊपर की गई है, लेकिन कुछ लक्षणों को लेकर सावधानी आवश्यक है। डा. रानी गुप्ता के अनुसार, अचानक भारी ब्लिडिंग होना, कई बार सेक्सुअल कॉन्टैक्ट से हल्की ब्लिडिंग हो जाना, योनि में सूखापन आना एक ऐसी समस्या है, जिसे लेकर डॉक्टर से मिलकर निदान करने की जरूरत है। आयुर्वेद में भी इसके ऐसे उपचार हैं, जो इन समस्याओं का समाधान करने में सक्षम हैं।
एक अच्छी डाइट और मसल्स को मजबूती देने वाले एक्सरसाइज को नियमित रूटीन में लाना फायदेमंद होता है।
विशेषरूप से 40 पार कर चुकी महिलाओं को अल्ट्रासाउंड, मैमोग्राफी जैसे टेस्ट कराने की सलाह दी जाती है। साल में एक बार हेल्थ चेकअप कराना सही होता है।
नोट-लगातार 1 साल तक पीरियड बंद होने के बाद जब मेनोपॉज होता है तब मसल मास लॉस होने, हृदय स्वास्थ्य पर असर होने, मेटाबोलिज्म कम हो जाने की आम समस्या हो सकती है, क्योंकि एस्ट्रोजेन नहीं बनता। ऐसे में अपनी देखभाल करना, जैसे कि पहले चर्चा की गई है सबसे जरूरी है। अगर मेनोपॉज के बाद किसी भी वजह से थोड़ी सी भी मासिक रक्तस्राव हो जाए तो तुरंत डॉक्टर के पास जाएं क्योंकि यह किसी स्वास्थ्य चेतावनी का संकेत हो सकता है।
अस्वीकरण- ध्यान रखें, यह लेख केवल आपकी जागरूकता के लिये है, इसे स्वास्थ्य सलाह के रूप में नहीं लें, जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से मिलकर सलाह लें।