कहते हैं आज से कुछ सौ साल पहले हिन्दुस्तान के पड़ोस के देश में एक बादशाह हुआ करते थे। उनकी बादशाहत में प्रजा अमन – चैन की बंशी बजाया करती थी। बादशाह बहुत ही रहमदिल और इन्साफ पसंद थे।उनकी सल्तनत में एक बुढ़िया अपने एकलौते बेटे के साथ रहती थी। इस युग में ही पेट परेशान नहीं करता है बल्कि उस जमाने में भी परेशानी का बहुत बड़ा सबब था।
दोनों जून चुल्हा जलाने की जुगत में बुढ़िया का बेटा लम्बे लम्बे सफर पर रवाना हो जाता था। बादशाह की सल्तनत की सीमा में ही , रहजनों ने बुढ़िया के बेटे को लूट लिया और उसके हलाक भी कर दिया। बुढ़िया को खबर मिली लेकिन वह न रोयी न चिल्लाई।
सीधे बादशाह के पास चली गयी और कहा कि बादशाह सलामत तुम्हारी सल्तनत में मेरा बेटा लूटा गया और मौत के घाट उतार दिया गया।
बादशाह ने बहुत अफसोस जाहिर किया। बुढ़िया ने कहा कि अफसोस जाहिर करने से आपका जुर्म खत्म नहीं होता क्योंकि जिस सल्तनत में खुले आम कत्ल और रहजनी होती हो वहाँ के बादशाह को तख्त पर बैठे रहने का कोई हक नहीं।
इसलिये या तो हुजूरे आला तख्त छोड़ दें या सल्तनत में अमन चैन कायम करें ताकि कोई रिआया रहजनी या कत्ल का शिकार न हो।
ऐसा कहा जाता है कि बादशाह बहुत शर्मिंदा हुये और बुढ़िया का शुक्रिया अदा किया जिसने उनकी कमियों की ओर बेखौफ इशारा किया। बादशाह ने सख्ती से अमनचैन की व्यवस्था करते हुये बुढ़िया के भरन पोषण का इन्तजाम कर दिया।
वही बुढ़िया इस जमाने में भी आ गयी। इसबार भी बुढ़िया का एकलौता बेटा मारा गया लेकिन उसे रहजनों ने नहीं , दंगाइयों ने मारा। आदत से मजबूर बुढ़िया फिर रोती हुई बादशाह के पास पहुँची।
बादशाह के यहाँ मिलनेवालों की कतार लगी हुई थी। बुढ़िया रोती , कतार छोड़कर आगे बढ़ने लगी। बुढ़िया को कतार छोड़कर आगे बढ़ते देख कतारवाले और बादशाह की हिफाजत करने वाले सिपाही इस पर डपटे।
बुढ़िया रोती हुई अपनी विपदा सुनाने लगी। कतार में लगी दूसरी बुढ़िया ने कहा कि तू एक के लिये झक रही है मेरा तो पूरा कुनवा ही साफ हो गया है।
यही नहीं , सारी सम्पति भी दंगाई लूट कर चले गये और जो बचा था वह बादशाह के कोतवाल साहब उठा लाये। बुढ़िया धीरे से कतारबन्द हो गयी। कतार में लगे महीनों बीत गये।
कुछ छोड़कर भाग गये लेकिन बुढ़िया लगी रही। आखिर बादशाह सलामत ने दीदार का हुक्म अता फरमा दिया। बुढ़िया का आधा रंजोगम खतम हो गया।
कतार में लगे – लगे उब चुकी थी। बादशाह की बुलाहट पर बुढ़िया को हुजूरे आला के दीदार गाह में ले जाया गया। वह कुछ कहना ही चाहती थी कि उसकी नजर बादशाह पर पड़ गयी और वह कहते – कहते रूक गयी। और बगैर कुछ कहे लौट आयी। कतार वाली पहली बुढ़िया ने
पूछा कि अपनी बातें बादशाह सलामत के पास रखी। इसने इन्कारी सिर हिलाया।
पहली ने पूछा , क्यों ? बुढ़िया ने कहा मेरे बेटे हत्यारे का सरगना ही तख्त पर बैठा था। शिकायत क्या करती और किससे करती। तबसे बुढ़िया इन्साफ के लिए दर दर भटक रही है।
उपर्युक्त यह कहानी परत – दर – परत पुस्तक लेखक सिद्वेश्वर नाथ पांडेय के द्वारा लिखी गई है। यह विकल्प – मीमांसा के संपादकीय सलाहकार भी रहे है। अब वह दिवंगत है।