कहानी ; वंश परम्परा

 

हिन्दुस्तान परम्पराओं का मुल्क है। परम्पराओं में ही प्राण बसते हैं। भाषा बदलकर कह सकते हैं कि हमारी संस्कृति का उत्स , परम्परा है। हमारे मित्र वर्मा साहब युनिवर्सिटी में फिजिक्स पढ़ाते हैं। लड़कों को पढ़ाते हैं कि सूरज पृथ्वी के बीच चंद्रमा घूमते आ जाता है तो सूरज ग्रहण लगता है , और चंद्रमा सूरज के बीच पृथ्वी आती है तो चंद्रग्रहण लगता है।

लेकिन ग्रहण के लगने के बाद सपरिवार गंगा स्नान अवश्य करते हैं क्योंकि हमारी मान्यता है कि चंद्रमा को राहू – केतु ग्रसता है , उससे जो पाप शरीर पर चढ़ता है , उसे धोने के लिये गंगा स्नान जरूरी है। यह हमारी परम्परा है , संस्कृति के रक्षक होने के नाते , स्नान जरूरी है।

लेकिन पंडित का , कुछ और ही कहना है कि परम्पराओं का चलन सर्वभौम नहीं है। वे एक कहानी सुनाते हैं कि एक नयी व्याही दुलहन     घर आयी तो सासुजी उसकी आरती उतारने के लिये , थाल में फूल रोली चंदन , दही अक्षत लेकर दरवाजे की ओर बढ़े । इसी बीच उन्हें कोई काम याद आ गयी। उन्होंने थाली चौकी पर रख दिया और चली गयी।

कुछ ही क्षण के बाद लौटीं तो उनकी नजर थाली पर गयी। एक बिल्ली थाली में मुँह लगा दिया था। सासुजी को गुस्सा आया और वहीं से एक ईट चला दिया।

बिल्ली के मर्मस्थल पर ईट लगी , बिल्ली मर गयी। बहू दरवाजे पर थी , मरी बिल्ली को हटाने के लिये आदमी की जरूरत पड़ती इसलिये तत्काल एक टोकड़ी से सासुजी ने ढंक दिया और बहू को लाने चली गयी। बहू के आगमन में भाग – दौड़ में बिल्ली की याद भुल गयी। बहू की नजर घूघंट से ही ढँकी हुई टोकड़ी पर पड़ गयी। उसकी उत्सुकता बढ़ गयी।

रात में छोटी मोटी शंकाओं के लिये बाहर निकली तो धीरे से टोकड़ी उठाकर मरी हुई बिल्ली देख लिया। बात आयी गयी में रह गयी कि मरी बिल्ली क्यों टोकरी से ढंकी गयी।

समय का अंतराल हुआ सासु ने बहू को बताया नहीं और कुछ समय के बाद सासुजी की मृत्यु भी हो गयी। मरते समय भी न सास बता सकी और न बहू ने पूछा ही।

कालांतर में बहू भी बेटा व्याह ने चली। दरवाजे पर बहू आयी तो सासुजी ने हुक्म दिया कि एक बिल्ली मारकर रखा जाय। लोगों ने पूछा क्यों ? यह हमारे वंश की परम्परा है बहू से सास बनी ने कहा। उस परिवार में आज भी बिल्लियों का मरना जारी है। परम्पराये ऐसी भी चलती है।

ऐसी ही परम्परा में हमारे यहाँ वंश परम्परा है। पिता की मृत्यु होने पर ज्येष्ठ पुत्र को पगड़ी बंधायी की रस्म होती है। बेला नागा हमारे यहाँ यह परम्परा जारी है। बिरले ही इसे तोड़ते हैं। हमारी जनता का इसमें अटूट विश्वास है।

राजा के मरने के बाद राजा का बड़ा बेटा राजा बनता है उसी क्रम में यह भी जारी है। इसी का परिणाम है कि मंत्री मरता है तो उसका बेटा
या बीबी मंत्री बनती है। एम. एल. ए. मरता है तो टिकट उसके बेटे , बेटी या पत्नी को टिकट मिलता है। जनता उसे वोट भी देती है।
नेहरू मरे – इंदिराजी आयी , इंदिराजी मारी गयी – राजीव जी आये। राजीव मारे गये , लोगों ने वंश परम्परा तोड़नी चाही।

कांग्रेस का पराभव हो गया। हल्ला मचने लगा – राजा को लाओ उसके खानदान को लाओ और अन्तत; राजीव की विधवा सोनिया आ ही गयी। सारे कांग्रेसी खुश। कहीं कोई विरोध का स्वर नहीं।

उपर्युक्त यह कहानी परत – दर – परत पुस्तक लेखक सिद्वेश्वर नाथ पांडेय के द्वारा लिखी गई है। यह विकल्प – मीमांसा के संपादकीय सलाहकार भी रहे है। अब वह दिवंगत है।