कृष्ण जन्माष्टमी पर झूला सजाने की परंपरा क्यों है? जानिए इसका ख़ास महत्व ?

 

मीमांसा डेस्क।

जन्माष्टमी का त्योहार भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में पूरे देश में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन भक्त आधी रात को भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप यानी लड्डू गोपाल का जन्मोत्सव मनाते हैं। मंदिरों और घरों में भी कान्हा के लिए विशेष रूप से झूला सजाया जाता है और उन्हें उसमें विराजमान कर झूला झुलाया जाता है। कहीं फूलों से झांकी सजती है तो कहीं पालने को रंग-बिरंगे वस्त्रों और मोतियों से भी सजाया जाता है। लेकिन कृष्ण जन्माष्टमी पर झूला सजाने की परंपरा क्यों है? उसके बारे में हम आपसे चर्चा करते है।

  • भगवान कृष्ण को झुला झुलाने की क्या परंपरा है ?

भगवान कृष्ण को झुला झुलाने की विशेष मान्यता है अब हम उसके पीछे के कारण आपको बताते है।

  •     बाल रूप में श्रीकृष्ण को झूला झुलाने की परंपरा।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। श्रीकृष्ण के जन्म के समय मथुरा में कंस का अत्याचार था। भगवान के जन्म के बाद वसुदेव उन्हें यमुना पार करके गोकुल में नंद बाबा के घर ले गए। इसके बाद नंद भवन में बाल कृष्ण के आगमन पर उत्सव मनाया गया। इसी बाल स्वरूप की स्मृति में जन्माष्टमी पर लड्डू गोपाल को पालने या झूले में विराजमान करने की परंपरा मानी जाती है। भक्त बाल कृष्ण को अपने घर का बालक मानकर उनकी सेवा करते हैं और प्रेमपूर्वक उन्हें झूला झुलाते हैं।

  •    नंद बाबा के घर मनाया गया था उत्सव।

श्रीकृष्ण के गोकुल पहुंचने के बाद नंद बाबा के घर जन्मोत्सव का उल्लास छा गया था। धार्मिक कथाओं में भी नंदोत्सव का विशेष वर्णन मिलता है। गोकुलवासियों ने बाल कृष्ण के जन्म की खुशी में उत्सव मनाया और उन्हें बाल रूप में दुलार दिया। इसी भाव को जन्माष्टमी के दिन भक्त अपने घरों में दोहराते हैं। भगवान के लिए पालना सजाया जाता है और जन्म के समय उन्हें उसमें विराजमान कर झूला झुलाया जाता है। कई स्थानों पर जन्माष्टमी की रात भगवान के जन्म के बाद ही पालना झुलाने की रस्म शुरू होती है।

  •  मां यशोदा के वात्सल्य से भी जुड़ी है मान्यता।

लड्डू गोपाल को झूला झुलाने की परंपरा भगवान श्रीकृष्ण के बाल रूप और माता यशोदा के वात्सल्य भाव से भी जुड़ी मानी जाती है। गोकुल में यशोदा मैया बाल कृष्ण को अपने पुत्र के समान प्रेम करती थीं। बाल कृष्ण की बाल लीलाओं में उनका वात्सल्य भाव विशेष रूप से दिखाई देता है। जन्माष्टमी पर भक्त भी भगवान के बाल रूप के प्रति इसी वात्सल्य भाव को प्रकट करते हैं। वे लड्डू गोपाल को स्नान कराते हैं, नए वस्त्र पहनाते हैं, उनका श्रृंगार करते हैं और फिर उन्हें सुंदर पालने में बैठाकर झूला झुलाते हैं।

  • जन्म के बाद झूला झुलाने की परंपरा।

कई घरों और मंदिरों में जन्माष्टमी की पूजा रात में भगवान कृष्ण के जन्म समय के आसपास की जाती है। जन्म की पूजा पूरी होने के बाद लड्डू गोपाल को पालने में विराजमान कराया जाता है। इसके बाद भक्त उन्हें धीरे-धीरे झूला झुलाते हैं। इस दौरान भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा की जाती है और उनके जन्म की खुशी में भजन-कीर्तन भी किए जाते हैं। भक्त कान्हा को माखन, मिश्री, मिठाई और अन्य भोग अर्पित करते हैं।

  • भक्त क्यों झुलाते हैं कान्हा को झूला

धार्मिक मान्यता में लड्डू गोपाल को झूला झुलाना भगवान के बाल रूप के प्रति प्रेम और भक्ति प्रकट करने का एक तरीका भी माना जाता है। भक्त उन्हें अपने परिवार के छोटे बच्चे की तरह मानकर उनकी सेवा करते हैं। यही कारण है कि जन्माष्टमी पर भगवान के लिए पालना सजाने और झूला झुलाने की परंपरा आज भी घर-घर में दिखाई देती है।

  • मंदिरों में भी होता है इस दिन विशेष आयोजन।

जन्माष्टमी के अवसर पर भगवान कृष्ण के मंदिरों में भी झूला उत्सव का आयोजन किया जाता है। मंदिरों में भी विशेष रूप से सजाए गए पालने में लड्डू गोपाल को विराजमान कराया जाता है। भक्त बारी-बारी से भगवान को झूला झुलाते हैं और उनके बाल स्वरूप के दर्शन करते हैं। कई मंदिरों में जन्माष्टमी के अवसर पर झूलों को फूलों और रोशनी से सजाया जाता है। जन्म के बाद भगवान के जयकारे लगाए जाते हैं और भक्त भजन-कीर्तन करते हुए उत्सव मनाते हैं।

इस तरह जन्माष्टमी पर लड्डू गोपाल को झूला झुलाने की परंपरा भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप, गोकुल के जन्मोत्सव और माता यशोदा के वात्सल्य भाव से जुड़ी धार्मिक परंपरा मानी जाती है। भक्त जन्माष्टमी की रात बाल कृष्ण को पालने में विराजमान कर उनके जन्म की खुशी मनाते हैं और प्रेमपूर्वक उन्हें झूला झुलाते हैं।

नोट – यह आर्टिकल केवल जागरूकता के लिये है इस आर्टिकल का उद्देश्य किसी की भी धार्मिक भावनाओं को आहत करना नहीं है।