यहाँ रेत के हर कण में एक कहानी सोई है ,
धुड़लो की परंपरा में नारी की लाज रोई है।
साँझ ढ़ले गाँव में दीपों की कतारें जलती हैं ,
नन्ही हथेलीं में आशा की ज्योति पलती है।
सिर पे मटकी अंदर दीप बाहर अंधेरा भारी ,
कदम – कदम पे चलती हिम्मत बन हर नारी।
इस धरा पर छाया एक काला – सा साया था ,
लालच , अन्याय , डर ने मानवता भरमाया था।
मासूमों की आँखों में डर का सागर लहराया ,
वीरों ने तलवार उठा अन्याय को दूर भगाया।
जंग तलवारों की नहीं सम्मान की लड़ाई थी ,
बेटियों की हँसी पे जान की बाज़ी लगाई थी।
जब ये पर्व आता दिल में वही जज़्बा जगता ,
हर गीत , इतिहास बोलता दीप अंधेरा हरता।
धुड़लो ; घुमेलो जी घुमेला। गलियों गूँज उठे ,
लगता जैसे बीते पल फिर से जीवित हो उठे।
यह सिर्फ़ त्यौहार नहीं ये एक पुकार पुरानी है ,
नारी गरिमा की रक्षा हर युग की ये कहानी है।
मिलकर वचन करें हम नहीं अन्याय को सहेंगे ,
हर बेटी की हँसी के लिए हम अंधेरों से लड़ेंगे।
उपर्युक्त पक्तियां लेखक संजय एम तराणेकर द्वारा लिखी गई है।