अंधेरा शाश्वत है। अनादि है , आकाश है। इसी को मिटाने के लिये ब्रह्माण्ड में सूर्यो का जन्म होता है। जहाँ तक रोशनी है , वहीं तक उजाला है। शेष , अंधेरा ही अंधेरा है। मनुष्य अंधेरे से डरता है इसी लिये डरकर उसकी वाणी फूटी थी। तमसो मा ज्योतिर्मय अंधेरे से उजाले की ओर ले चलो। इस वाक्य की व्याख्या बाद में ज्ञानियों ने और विस्तृत ढंग से किया।
अंधकार को अज्ञान माना। ज्ञान को प्रकाश कहा। लोप होना अज्ञानता है।
प्राकट्य ही ज्ञान है , प्रकाश है। जो गोपन है अज्ञान है।
प्रकाश सूर्य से मिलता है। सूर्य जीवनदाता है। सूर्य की किरणें धरती पर उतरती हैं , जीवन स्पंदित होता है। किसलय मुस्कुराते हैं। सूर्य की किरणों का धरती पर नहीं आना ही महाप्रलय या सृष्टि का अंत होता है। शायद इसीलिए सूर्य की आराधना हुई। जहाँ सूर्य का प्रचंडरूप है , वहाँ सूर्य से ही भासित चंद्रमा आराध्य हो गया।
मनुष्य हरपल हरक्षण संघर्ष से ही जिंदा है। संघर्ष समाप्त , जिंदगी समाप्त। संघर्ष ही जिंदगी है।
सूर्य चंद्रमा के प्रकाश के बाद , अंधेरे का साम्राज्य शुरू होता है। अंधेरे से संघर्ष के लिये दीपक का अविष्कार हुआ। चर्बी , बनस्पति तथा जैविक तेल से पहले काम चलाया फिर धरती का सीना फाड़कर मिट्टी का तेल निकाला वो अंधकार को भगाने में सहायक हुआ।
धन से आँखे चकाचौंध हो सकती है लेकिन प्रकाश पैदा नहीं हो सकता। धन प्रकाश के लिये साधन मुहैया करता है और प्रकाश के सारे साधनों पर धनवानों का कब्जा है।
राष्ट मात्र कागज पर बनी चंद लकीरें नहीं है। अन्दर रहने वाले आदमियों की उपस्थिति से ही राष्ट बनता है। राष्ट के अन्दर रहने वालों की जिंदगी की गारंटी सविधान देता है। व्यक्ति को विश्वास हो जायेगा ,
राष्ट उसका है। राष्ट की रक्षा में ही उसकी रक्षा निहीत है – राष्ट के लिये वह जान दे देगा – अन्यथा कोऊ नृप होहिं हमें का हानि , चेरि छाड़ि ना होयब रानी ,,
आजादी के बाद , राष्ट निर्माताओं ने सविधान में , शोषित , पीड़ितों के लिये आरक्षण तथा सब्सीडियों का प्रावधान किया ताकि समाज में व्याप्त असमानताओं में कुछ कमी आ सके। ज्ञान भारत में सबको मिले , दलित ऊपर उठे – घर – घर में प्रकाश फैले , इसी की कामना सविंधान में की गयी। मनुष्य राष्ट का धरोहर होता है।
धरोहर के बचाव के लिये भोजन , चिकित्सा , ज्ञान को मुफ्त एवं अनिवार्य बनाया गया। जब हिन्दुस्तान गुलाम था तब भी भोजन पर सब्सीडी थी। चिकित्सा शुल्क मुक्त था।
आजाद भारत में सरकारों की सोच ही अमानवीय हो गयी है। ज्ञान सबको ना मिले इसलिए ज्ञान को निजी हाथ में देकर महंगा कर दिया गया। जनसंख्या को कम करने के लिये चिकित्सा को महंगा कर दिया। बिना इलाज के गरीब लोग मरेंगे। इससे जनसंख्या तथा गरीबों की संख्या में कमी आयेगी।
गरीब मरेंगे – अमीरों की संख्या बढ़ेगी। झोपड़ियाँ मिट्टी तेल से ही रौशन होती हैं। झोपड़ी में गरीब रहते हैं उनकी झोपड़ियों से बजट ने उजाला छीनने की कोशिश की किरासन तेल महंगा कर दिया गया। पेट्रोल सस्ता हो गया।
गरीब खतम हो , अमीर बढ़ें – इसी सोच के साथ मौजूदा सरकार की अंधेरे की ओर बढ़ते एक कदम और।
उपर्युक्त यह कहानी परत – दर – परत पुस्तक लेखक सिद्वेश्वर नाथ पांडेय के द्वारा लिखी गई है। यह विकल्प – मीमांसा के संपादकीय सलाहकार भी रहे है। अब वह दिवंगत है।