सीख

 

नये दारोगाजी थाने में पदभार ग्रहण किये। बेचारे पहली बार घर से बाहर निकले थे। पदभार ग्रहण करते ही थानेदार ने उन्हें रात वाली गश्ती थमा दी। जिन्दगी में पहली बार जिप्सी जीप पर छ; रायफलधारी और एक हवलदार के साथ दारोगाजी रात्रि गश्ती में निकल पड़े। नया रंगरूट समझकर हवालदार साहब उन्हें पुलिसिया गुर समझाने लगे।

हवालदार साहब ने बताया कि हुजूर अब तक किताब में आप जो भी पढ़े हैं उसे भूल जाइये। पुलिस की पढ़ाई अलग होती है खासकर व्यावहारिक पढ़ाई , दुनिया के सभी ज्ञान से अलग होती है। वर्दी पहनने के बाद , आप भूल जाइये कि आपका कोई मित्र या रिश्तेदार है। आपकी नजर में सारे लोग एक समान है। सबेरे उठकर सबसे पहले भगवान को सर झुकाइये और प्रेयर कीजिये कि दिन आराम से गुजरे। आराम से दिन गुजरने के लिये आवश्यक हैं कि कोई – न – कोई छोटा – मोटा वारदात हो। खून हो जाये तो समझियेगा कि आपके नाम लॉटरी निकल आयी। डकैती वगैरह हो तो भी पौ बारह। एक बात का खास ख्याल रखियेगा।

किसी भी वारदात पर शरीफ लेकिन मालदार का नाम कहीं – न कहीं उन मुकदमों में अवश्य ही सटना चाहिये क्योंकि तिजोरी वे ही खोल सकते हैं। लफंगों से बचने की कोशिश करनी चाहिये , उनको रपटने से बालू से तेल निकालने जैसा होगा। लेकिन एक बात का खास ख्याल भी रखना होगा , शेर के शिकार से निराश लौटने वाला शिकारी तीतर से भी परहेज नहीं करता। इसके अतिरिक्त कुछ खास गवाह अपने साथ अवश्य रखिये जिसका उपयोग आप गाढ़े वक्त पर कर सकें। दारोगाजी बेचारे चुप – चाप हुँकारी भरते जा रहे थे। इसी बातचीत के क्रम में समय गुजरता जा रहा था। सड़कें सुनासान , एक भी शिकार दिखाई नहीं पड़ रहा था।

एकाएक सभी लोगों की वांछे खिल गयी। एक रिक्शा वाला बड़ी मस्ती में झुमताझामता हुआ रिक्शा चलाते आ रहा था। उसकी मस्ती से लग रहा था कि कमाई अच्छी हुई होगी। जिप्सी ठीक रिक्शा के सामने रूक गयी। रिक्शा वाला ब्रेक मार कर हक्का बक्का होकर जीप की ओर देखने लगा। रिक्शा तो सड़क की बायीं ओर थी फिर पैट्रोल जीप रूकने का मतलब क्या है ? तबतक जीप से हवलदार साहब उतरे और रिक्शा वाले का कॉलर पकड़कर दो तमाचा दिया और कहा ,, साले फ्रेजर रोड वाले बैंक डकैती में तू ही था न। हम एक महीने से तुझे खोज रहे थे। आज पकड़ में आया है। साले पब्लिक को झाँसा देने के लिये रिक्शा चला रहा है।

रिक्शावाला हवालदार साहब का मुँह ताके जा रहा था। उसकी प्रत्युपत्रमति काम आयी और रिक्शा से उतरकर हवलदार साहब के पैर पर गिर पड़ा। साला एक्टिंग कर रहा है। चल थाने में , सारी एक्टिंग भुला देते हैं। हवालदार साहब बोले। साले इतनी रात को कहाँ से आ रहा है। बोल ,, कहाँ डकैती की। ,, कितना माल हाथ लगा। एक ही साँस में हवलदार साहब चिल्लाये और उसी के साथ उसके पॉकेट में हाथ डाल दिया। फिर सारे शरीर की खानातलाशी ली। कुल 37रुपये मिले।

रिक्शावाला हाथ जोड़े गिड़गिड़ाया , हुज़ूर 16 घंटे की कमाई है। रख लिया जाय। अब कभी देर रात तक रिक्शा नहीं चलाऊंगा। हवालदार साहब ने दो झापड़ और रसीद किया। कहा कि ठीक है जा आज छोड़ देता हूँ। फिर इस तरफ दिखाई पड़ा तो अन्दर कर दूँगा। ,, रिक्शावाला बेतहाशा रिक्शा लेकर भागा। हवलदार साहब अकड़ते हुये दारोगा जी के पास आये और कहा ,, हुजूर – थानेदारी ऐसे चलती है। ,, दारोगा जी हवालदार साहब की ओर एक टक से देखते रह गये।

उपर्युक्त यह कहानी परत – दर – परत पुस्तक लेखक सिद्वेश्वर नाथ पांडेय के द्वारा लिखी गई है। यह विकल्प – मीमांसा के संपादकीय सलाहकार भी रहे है। अब वह दिवंगत है।