शीर्षक से चौंकिये मत। यह वाक्यांश आप जैसे ही –
पटना मेडिकल कॉलेज हॉस्पीटल में प्रवेश करेंगे तो वहाँ के दो स्पेशल वार्ड की दीवाल पर , जगह – जगह पर लिखा हुआ मिलेगा। एक वार्ड का नाम है – टाटा वार्ड दूसरा इन्दिरा गांधी इमरजेन्सी वार्ड। मैं उसे देखकर अनदेखा करके आगे बढ़ने लगा। मेरे साथ आशुतोष बाबू भी थे। उन्होंने मुझे रोककर उक्त पट्टिका को गौर से देखने को कहा। चश्मा को रूमाल से पोंछकर मैंने फिर से देखने की कोशिश की। कहीं कुछ परिवर्त्तन नहीं लगा। मैंने उनकी ओर सवालिया निगाह से देखा। आशुतोष बाबू ने मुस्कुराते हुए कहा – तुम्हारे लिए छटनी की तलवार है और तुम अनदेखा करके आगे बढ़ रहे हो। मैंने पूछा – वो कैसे ? उन्होंने कहा कि सुनो। इस देश का पूंजीपति मध्यम वर्गीय मजदूरों की एकता से घबड़ा चुका था। जिस दर से व मुनाफा चाहता था वह मिल नहीं रहा था। यहां का मजदूर लगातार अपनी जुझारू एकता और लड़ाई के बल पर अपनी स्थिति में सुधार लाता है।
पूँजीपतियों ने सरकार पर दवाब डाला। उसी के तहत सरकार ने आई. एम. एफ. विश्व बैंक से कर्जा लेने की पेशकश की। आई.एम.एफ. ने सारी शर्त्तो के अलावे यह भी शर्त्त रख दिया कि सरकारी उपक्रमों को निजी हाथ में बेंच दो। मैं उनको गौर से सुनता रहा। उन्होंने आगे कहा कि उसी के तहत सरकार ने निजीकरण का सिलसिला शुरू कर दिया है। उसी सिलसिले का एक पहलू यह वाक्यांश भी है।
आशुतोष बाबू बोले – तुम्हारे अस्पताल में सफाई मजदूरों की कमी है। मैंने कहा नहीं तो। तो फिर सुलभ शौचालय के सौजन्य से सफाई क्यों ? मैं चुप रहा।
उन्होंने कहा कि षड्यंत्र के तहत पहले यह प्रचारित कराया कराया गया कि सार्वजनिक सेक्टर में काम नहीं होता। सारे सरकारी कर्मचारी कामचोर होते हैं। बहुप्रचारित करने से जनता अलग हो जाय और कर्मचारी के साथ जनता भी हल्ला न करे। तुमने देखा बाहर का आदमी आकर काम कर रहा है कहीं कुछ विरोध नहीं , बल्कि जनता इस कार्य के लिए सरकार की तारीफ ही कर रही है।
अब जितने भी सफाई कर्मचारी सेवा निवृत होंगे उनकी जगह पर नयी बहाली न करके सुलभ इन्टर नेशनल से कराया जायेगा।
इससे सरकार को क्या फायदा होगा ? असली फायदा तो सरकार को ही है। संगठित क्षेत्र का मजदूर लड़ – झगड़कर अपनी तनख्वाह बढ़वाये हुये है। पी. एम. सी. एच. का एक सफाई मजदूर 1500 रु के लगभग तनख्वाह पाता है इसके अतिरिक्त पेंशन बोनस अलग है। अब सुलभ इंटरनेशनल के मजदूरों से पूछा जो सफाई का काम करते हैं। नहीं – मैंने कहा। जाकर पूछो – उन्हें छ; सौ महावारी मिलती है। बोनस , पेंशन का झंझट नहीं है। सरकार को फायदा है अथवा नहीं ? इसीलिए सरकार मजदूरों का पेट काटने के लिए निजीकरण का हंगामा उठाये हुए हैं।
मैं आशुतोष बाबू का मुँह देखता रह गया।
उपर्युक्त यह कहानी परत – दर – परत पुस्तक लेखक सिद्वेश्वर नाथ पांडेय के द्वारा लिखी गई है। यह विकल्प – मीमांसा के संपादकीय सलाहकार भी रहे है। अब वह दिवंगत है।