सर्वेश्वर दयाल सरकारी महकमें में अस्थायी कर्मचारी हैं। स्थायी करने के लिए सर्वेश्वर दयाल की संचिका बढ़ी। नेताओं ने उनकी संचिका को मुख्य अभियंता तक बढ़वाया। मुख्य अभियंता ने संचिका अभियंता प्रमुख के यहाँ भेज दी। संचिका वहाँ जाकर अटक गयी। अभियंता प्रमुख के सासमखास पी.ए. ने संचिका रोक दी। खबर उम्मीदवारों तक भेजवाई कि वे मिलें।
सारे उम्मीदवार उनसे मिले। हुक्म हुआ कि फी उम्मीदवार दो हजार रुपये जमा कीजिये तब काम होगा। उम्मीदवार नेतागण के पास पहुँचे। नेताओं ने पी. ए. साहब ने फैसला सुनाया कि संचिका ऑब्जेक्स्न के साथ लौटा दी जायेगी।
नेता लोग उच्च पदाधिकारियों से मिले। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि जो भी हो रहा है वे ठीक हो रहा है। नेताओं ने इसके खिलाफ आन्दोलन की तैयारी शुरू कर दी।
इसी बीच सर्वेश्वर दयाल एक दबंग एम.एल. ए. के पास पहुँचे। एम. एल. ए. साहब उनके पुराने परिचित थे। उनसे सर्वेश्वर दयाल रोये गाये। एम.एल. ए. साहब अपने 15 निजी अंगरक्षकों के साथ अधिकारी के समक्ष पहुँचे। अशिष्ट भाषा में गालियाँ दी , धमकाया। अधिकारी महोदय को कपकपी छूट गयी। कहना न होगा कि सचिका का ऑब्जेक्स्न खतम हो गया। सर्वेश्वर दयाल स्थायी हो गये।
उपर्युक्त यह कहानी परत – दर – परत पुस्तक लेखक सिद्वेश्वर नाथ पांडेय के द्वारा लिखी गई है। यह विकल्प – मीमांसा के संपादकीय सलाहकार भी रहे है। अब वह दिवंगत है।