मरीज दर्द से छटपटा रहा है। डाक्टर सूई पर सूई दिये जा रहा है लेकिन मरीज की बेचैनी समाप्त नहीं हो रही है। डाक्टर थक कर माथे का पसीना पोंछ रहा है।
मरीज कराह कर डाक्टर से कहता है – मैं पहले ही कह रहा था कि मेरे दर्द का इलाज , तुम्हारे पास नहीं है। लेकिन तुम माने नहीं।
डाक्टर होने के नाते आपकी तकलीफ को दूर करना मेरा कर्त्तव्य है ,, डाक्टर ने कहा।
डाक्टर। न मुझे नींद आयेगी और न दर्द जायेगा ,, मरीज ने कहा ,, फिर उपाय क्या है ,, डॉक्टर ने पूछा।
सेठ राम गोपाल मर्दाबाद का नारा मेरे दर्द को कम कर सकती है – मरीज ने कहा।
ऐ क्या कह रहे हैं सेठजी आप अपना मुर्दाबाद सुनना चाहते हैं। आश्चर्य है ,, डाक्टर ने कहा।
आश्चर्य नहीं डाक्टर हकीकत है। सेठ ने कहा।
आखिर क्यों भला ? डाक्टर ने कहा।
मैं अपनी फैक्टरी में जरूरत से ज्यादा माल उत्पादित कराके गोदाम में रख लेता था। दाम न घटे इसलिये माल को बाज़ार में धीरे – धीरे
भेजता था। इसी बीच मिल में तालाबन्दी करा देता था। मजदूर रोज गेट पर सेठ राम गोपाल मुर्दाबाद का नारा लगाते थे और मैं चैन की नींद
सोता था। माल खतम होने पर , सरकार से कुछ सबसीड़ी [अनुदान] लेकर तालाबंदी हटा लेता था। मजदूर की मजदूरी बचती थी और सरकार से पैसा भी लेता था। इस तरह तीन तरफा कमाई होती थी। सेठ ने कहा।
अब भी क्या बिगड़ा है तालाबंदी कर दीजिये ,, डाक्टर कहा।
वही तो दर्द है। मिल चालू हो गया है। सरकार ने मिल का अधिग्रहण कर लिया है। सेठ जी ने गहरी साँस लेकर कहा।
उपर्युक्त यह कहानी परत – दर – परत पुस्तक लेखक सिद्वेश्वर नाथ पांडेय के द्वारा लिखी गई है। यह विकल्प – मीमांसा के संपादकीय सलाहकार भी रहे है। अब वह दिवंगत है।