पिता होने का सुख

 

मीमांसा डेस्क।

पिता होने के सुख की अनुभूति इन्हीं शब्दों से होती है कि जब पिता कह उठते हैं – यकिन , नहीं होता कि यह हमारा बच्चा है। इसके गूढ़ अर्थ में जाये तो वे पिता बनकर बहुत ही आनंदित हैं। वे आन्दोलित हैं। नन्हे -2 हाथ – पैर , गोल – मटोल चेहरा देखकर। उनके पास इस आनंद को बाँटने के लिए शब्द भले ही न हो , परंतु वे उसे अपने हाथों में लेकर , छूकर अपनत्व के सागर में डुबकियां लगाने को आतुर रहते हैं , पिता होने का सुख उनके मनोभावों को व्यक्त करता है। आज वर्तमान में पापा मन ही मन नहीं अपितु अपने प्यार को व्यक्त कर अपने गौरवान्वित महसूस करते हैं।

  • सरक्षणात्मक कवच है

एक पिता के होने और न होने को खूब परिलक्षित किया जा सकता है इस संबंध में बॉलीवुड के एक सुपर सितारा नाम न प्रकाशित करने की एक शर्त पर बताते है – मैं जब पन्द्रह वर्ष का था , तभी मेरे पिता नहीं रहे।

हालांकि इतनी कम उम्र में यह बर्दाश्त कर पाना बहुत मुश्किल था। परंतु मैं रोया नहीं। इतना अवश्य लगा कि मैं समय से पूर्व ही बड़ा हो गया हूँ। कंधो पर ज़िम्मेदारियों का बोझ भी बढ़ गया था। मैंने वो सब किया जो वे स्वयं इस दुनिया में रहते हुए करते। परंतु उनका साया तो होना ही चाहिए था।

हम भले ही जिन्दगी की लड़ाई लड़ते रहें। लेकिन पिता की कमी को पूरा करना नामुकिन है क्योंकि पिता शब्द ही अपने आप में एक सरक्षणात्मक कवच हैं।

जब कोई किसी से पूछता है – तुम किसके बेटे हो या बेटी हो। और इससे आगे भी कि तुम्हारे पिताजी , का नाम क्या है। इन वाक्यों में ही उनके अस्तित्व का रहस्य परिलक्षित होता है।

सम्मान का दृष्टिकोण यहीं से प्रांरभ होता है। एक पहचान , जो यही से बनना प्रांरभ होती है। इसमें यह बात भी गौर करने वाली है। कि किसी भी आवेदन – पत्र या दस्तावेज में पिता के नाम का उल्लेख आवश्यक होता है। यह सही है कि वर्तमान में माँ का नाम भी अंकित किया जाने लगा हैं। परंतु पिता के नाम की महत्ता अभी भी बरकरार है।

पिता , पूजनीय हैं इसलिए नहीं कि वे जन्मदाता है , अपितु इसलिए कि वे अपने बच्चों को कठिनाईयो से संघर्ष करना सिखाते है। वहीं स्वाभिमान से जीने का पाठ भी पढ़ाते हैं।

पितृ दिवस यानि फादर्स डे भले ही पश्चिम की परम्परा क्यों न हो परंतु अनुकरणीय है। पिता के सम्मान में एक नए दिन की शुरुवात के रूप में देखा जाना चाहिये।