शहर की एक दुकान का ताला टूटा। सुबह में दुकान का ताला टूटा देखकर दुकानदार रोने कलपने लगा। पास – पड़ोस के लोगों ने थाने में खबर करने की राय दी दूकान में नया ताला डालकर , थाना पहुंचा। थाने में सलामी चुकाकर स्नेहा लिखवाया। दारोगा जी उसके साथ दुकान तक आये। दुकान में ताला देखकर वे चौंके। उन्होंने पुलिसवाला रोब दाब दिखाते हुये पूछा , ताला किसने लगाया ?
दुकानदार ने सहमते हुये कहा , हुज़ूर मैंने लगाया है। दारोगा जी ने विषैली मुस्कान के साथ कहा , साला हमीं को बेवकूफ बनाता है। खुद ही चोरी की और थाने में रपट भी लिखवाई। झूठा केस है। उलटा दफा में तुझे बंद करुँगा।
दुकानदार घबड़ा कर रोने लगा। दारोगाजी चिल्लाये , साला नौंटकी करता है। तेरे जैसे सैकड़ों को ठीक कर चुका हूँ। सर के बाल धूप में नहीं सफेद किये हैं।
दुकानदार ने कातर दृष्टि से भीड़ की ओर देखा। किसी की नजर में छुपने की जगह नहीं मिली। सभी नजरे सहमी हुई थीं। अचानक उसकी नजर नेता जी पर पड़ी और वह दौड़ कर उनका पैर पकड़ कर हिचकियाँ लेकर रोने लगा। नेता जी की पहुँच थाने तक थी। वे दुकानदार को उठाकर भीड़ से बाहर ले गये और थोड़ी देर बाद वे खीसें निपोरते हुए दारोगा जी के पास पहुंचे।
वहाँ पहुँचते हीं वे अपने पीछे सहमे हुये खड़े दुकानदार पर बिगड़े बेवकूफ हाकिम दरवाजे पर आये हुये हैं और अभी तक चाय पान का इन्तजाम नहीं किया है। उसके बाद नेता जी भीड़ पर डपटे , भागो यहाँ से यहाँ नाच हो रहा है क्या। बात की बात में भीड़ छँट गई।
और कुछ देर के बाद नेता जी , दारोगा जी चले गये।
दुकानदार ने लम्बी साँस ली और नेताजी को मन ही मन धन्यवाद दिया कि पाँच सौ रुपए में ही छुटकारा दिलवा दिया। उसके बाद पड़ोस के दुकानदारों को भरपेट गोलियों दी जिन्होंने उसे थाने
में रपट लिखवाने की राय दी थी।
उपर्युक्त यह कहानी परत – दर – परत पुस्तक लेखक सिद्वेश्वर नाथ पांडेय के द्वारा लिखी गई है। यह विकल्प – मीमांसा के संपादकीय सलाहकार भी रहे है। अब वह दिवंगत है।