अपराधी वही नहीं जो अपराध करता है ,,

 

इतिहास क्या है ? इति माने अंत हास माने कथा यानी जो बीत गया उसी की गाथा इतिहास है , ऐसा किवंदनित है। हर शासक इतिहास अपने मनोनुकूल लिखवाता है। आजादी की लड़ाई हुई। मुल्क आजाद हुआ। इतिहास लिखा गया। लाखों लोग जो लड़ाई में काम आये वो कहीं चर्चा के विषय नहीं बने। हाशिये पर भी उसका नाम नहीं छपा। मदन लाल डीगरा , चन्द्रशेखर आजाद , भगत सिंह , राम प्रसाद विस्मिल अशफाक उल्लाह खान , शिव वर्मा आदि प्रात; स्मरणीय के बारे में स्कूल के बच्चे , छोड़िये उसके मास्टर से भी पूछिये , जवाब नहीं देगा ? लेकिन —
क्या हुआ पंडित जी ? आशुतोष बाबू ने पूछा आजादी की लड़ाई में मेरे गाँव के राम सुमिरन सिंह अगुआ थे। पता नहीं कितनी लाठियाँ खाई , कितनी बार जेल गये। जेल जाने को तीर्थ यात्रा कहते थे। उस तीर्थ यात्रा के क्रम में देखा कि गांव के बहुत से चोर बटमार बलात्कारी आजादी के बाद भी जेल के अंदर थे। 1972 में स्वतंत्रता सेनानियों की पेंशन की बात चली तो जितने आजादी वाले थे उनमें से बहुत मर गये थे , कुछ ने तो स्वाभिमान वश पेंशन लेना पसंद नहीं किया , कुछ ने लिया लेकिन उस काल में जेल में जितने चोर डाकू थे सब के सब स्वतंत्रता सेनानी बन गये।
इससे आपको क्या तकलीफ हुई आशुतोष बाबू बोले –
तकलीफ इसलिये हो रही है कि जिन्होंने जिन्न्ना से भी पहले द्विराष्ट्र की वकालत की। अंग्रेज से माफी मांगके जेल से छूटे। आजादी की लड़ाई के खिलाफ अंग्रेजों की मदद की अंग्रेजों की मुखबरी की , आज आजादी की लड़ाई के बहादुरों के साथ उनकी भी मूर्त्तियों संसद में स्थापित की जा रही है।
इस काम वो कर रहे हैं वे जो आजादी की लड़ाई में माफी मांग कर अपने साथियों को फंसाया था।
बावजूद जनता चुप बैठी है दुख इसी बात का है।

उपर्युक्त यह कहानी परत – दर – परत पुस्तक लेखक सिद्वेश्वर नाथ पांडेय के द्वारा लिखी गई है। यह विकल्प – मीमांसा के संपादकीय सलाहकार भी रहे है। अब वह दिवंगत है।