रक्षक का भय

 

आशुतोष बाबू पर अक्सर दौरा पड़ता है। जहाँ कुछ देखा नहीं कि नकल में लग गये। इस बार गंगास्नान का शौक चर्राया। गंगा उनके घर से मीलो दूर है , बावजूद प्रत्येक त्रयोदशी को पैदल ही स्नान करने चले जाते हैं। आशुतोष बाबू की घरनी को भी गंगास्नान की प्रवल इच्छा होती लेकिन पैदल जाने की कल्पना से ही , वे स्नान पुण्य का मोह त्याग देती। पुण्य आखिर पुण्य होता है।

अन्दर में पुण्य करने की इच्छा प्रवल होने लगी और अन्त में , जी कड़ा करके वे तैयार हो गयीं। इरादा पक्का हो तो हल निकल ही आता है। उनकी दाई जो उनकी हमउम्र थी और सखी भी थी , गंगास्नान को तैयार हो गयी। त्रयोदशी के एक दिन पहले तीनों पैदल गंगाघाट की ओर चल दिये और रात होते वहाँ पहुँच गये।

अगले दिन सुबह यह तय हुआ कि आशुतोष बाबू पति – पत्नी साथ स्नान करेंगे और दाई गठरी की रखवाली करेगी। वे लोग स्नान करने चल दिये ।

और दाई गठरी की रखवाली करने लगी। इसी बीच एक सिपाही टहलते हुये दाई के बगल में खड़ा हो गया। डंडे को बगल में दाबकर सिपाही खैनी चूना हथेली पर रगड़ने लगा। सिपाही को देखकर दाई मुँह को विपरीत दिशा में करके बैठ गयी।

मौके की तलाश में बैठा हुआ एक उचक्का गठरी उठा कर चल दिया। सिपाही एक नजर गठरी पर डालकर , खैनी चूना रगड़ने में लग गया। थोड़ी देर के बाद सिपाही टहलता हुआ दूसरी जगह चला गया। सिपाही के जाते ही आशुतोष बाबू सपत्निक चले आये और दाई से पूछा गठरी कहाँ है ?

दाई ने कहा कि गठरी उठाकर एक आदमी चला गया। आशुतोष बाबू ने कहा कि गठरी चोर ले जा रहा था तो तुमने हल्ला क्यों नहीं किया।
हल्ला कैसे करती , सिपाही जो वहीं खड़ा था। दाई ने जवाब दिया। और मियां बीबी माथे पर हाथ रख कर बैठ गये।

उपर्युक्त कहानी विकल्प मीमांसा के संपादकीय सलाहकार रहे सिद्वेश्वर नाथ पांडेय द्वारा लिखी गई है। अब वह दिवंगत हैं।