चार दीवारों के भीतर, जब रिश्तों पर ताले लगते हैं,
तब सबसे पहले बचपन की मुस्कानें रोती हैं।
चार नहीं, साढ़े चार बरस बीत गए, माँ की आँखों में,
हर दिन एक नया इंतज़ार जन्म लेता रहता है।
कानून के पन्नों पर तो सिर्फ आदेश ही लिखे जाते हैं,
ममता की पुकार अब भी सुनवाई तलाशती है।
दो नन्हीं बेटियाँ, कभी माँ की उँगली थाम चलती थीं,
आज केवल यादों के सहारे ही बड़ी हो रही हैं।
उनके बचपन से “माँ की गोद” का मौसम छिन गया,
सच न्याय जीवित है, तो अर्थ सिर्फ फैसला नहीं।
यूं मासूम आँखों तक अपनों का स्नेह पहुँचाना भी है,
निष्पक्ष जाँच हो, पीड़ित को समान अवसर मिलें।
निर्णय का सम्मान हो, यहीं “लोकतंत्र” की पहचान है।
क्योंकि अदालतों का सम्मान तभी पूर्ण होता है,
जब उनके आदेश कागज़ों से निकल त्वरित न्याय हो,
ज़िंदगी में भी न्याय का सुख आँखोँ में दिखाई दें।
(संदर्भ – कोर्ट के आदेश के बाद भी 4.5 साल से बेटियों से दूर माँ )
उपर्युक्त पक्तियां कवि संजय एम तराणेकर द्वारा लिखी गई है।