यहाँ का हर फूल गूंगा क्यूँ है ?
मेरी अंगूठी में उदास मूंगा क्यूँ है ?
वो पंछी क्यूँ रो रहा है ?
उसके दिल में क्या हो रहा है ?
दाना – लाना – चुगना – खाना
और फिर रात के होने का इंतजार
ये सब कुछ पहले तो कभी नहीं सोचा।
जो सोचा है मैंने
आज तीन दिन के बाद
सांझ में इतनी उदासी क्यूँ है ?
हर सुबह इतनी बासी क्यों है ?
दिन ढलना , सांझ होना ,
बेवजह हँसना , बेवजह रोना ,
ये सब कुछ पहले तो कभी नहीं सोचा।
जो सोचा है मैंने
आज तीन दिन के बाद
अहा खारे पानी की वो मिठास
सख्त दाढ़ी की छुवन का वो एहसास
मैंने कभी समन्दर नहीं देखा।
कभी उस दिल को छूकर नहीं देखा।
ये सब कुछ पहले तो कभी नहीं सोचा।
जो सोचा है मैंने ,
आज तीन दिन के बाद
हाँ , मैंने सोचा है ये सब आज
जब सुनी है पिता की आवाज
आज तीन दिन के बाद
उपर्युक्त पक्तियां वरिष्ठ पत्रकार अमित तिवारी द्वारा लिखी गई है।