मोतिहारी – बेतिया – मोतिहारी – बेतिया की आवाज लगातार आ रही थी। कहाँ जाना है ? मोतिहारी। आइये , बैठ जाइये। एक्सप्रेस है , तुरत खुलेगी। लखनऊ मेल से सिवान में उतरे मुसाफिर दौड़ – दौड़ कर बस में चढ़ने लगे। सीट भरने के बाद छत पर लद गये। छत भरने के बाद बस के अन्दर जगह नहीं रही। फिर भी कंडक्टर खलासी आवाज लगाये जा रहा था। अन्दर की भीड़ का धैर्य टूटने लगा , लोग भुनभुनाने लगे। भुनभुनाहट से बेपरवाह समवेत स्वर में पाठ जारी था। ड्राइवर , चाय की दूकान पर चाय से अपनी हरासत कमकर रहा था। कुछ देर के बाद जब सवारियों की उम्मीद खतम हो गयी तब कन्डक्टर ने ड्राइवर को हांक दी और कुछ ही क्षण बाद बस खुल गयी। सवारियों ने लम्बी सांस ली और इत्मीनान से खैनी चूना हथेली पर रगड़ने लगे। शहर से बाहर निकलते ही कन्डक्टर किराया वसूलने में लग गया। किराया वसूलने से फारिग भी नहीं हुआ था कि दूसरा स्टोपेज आ गया और वहाँ की भीड़ का एक रेला बस के अंदर घुसने लगा। लेकिन अन्दर बाहर कहीं जगह तो थी नहीं। कन्डक्टर बस केअन्दर थक कर बैठे हुए सवारी को उठाने लगा।
लोग भुनभुनाये लेकिन कन्डक्टर की डपट के आगे चुपचाप खड़े हो गये। बाहर की सवारी चढ़ी। उस स्टोपेज पर दो सफैदपोश भी चढ़े।
क्या कन्डक्टर साहब लोग हम खड़े चलेंगे। उनमें एक ने जुमला उछाला।
नहीं साहब , चलिये जगह देते हैं और आगे की सीट पर से दो मजदूरनुमा सवारी को हाथ पकड़ कर उठा दिया और सफैदपोशों को बैठा दिया। इसी प्रकार हर स्टोपेज पर सफेदपोश चढ़ते और कन्डक्टर किसी ने किसी को उठाकर बैठाता रहा। कंडक्टर की इस कार्रवाई के खिलाफ बस के अन्दर चिमगोईयां शुरू थी लेकिन कन्डक्टर के गुंडापन के विरुद्ध कोई बोल नहीं रहा था। आवाज उठाने वाला सफैदपोश स्वयं उस सुविधा को उपभोग कर रहा था। इसलिए इन कार्रवाइयों को निस्पृह ढंग से देख रहा था।
सारे मजदूर पंजाब से कमा कर लौट रहे थे। जल्दी घर पहुँचने की बेताबी थी। कल्पना के सहारे वे देख रहे थे कि उनके घर के पास के बस स्टैंड पर उनकी पत्नियाँ और बच्चे प्रतिदिन प्रत्येक बस को देखते और उतरते मुसाफिरों में अपने पतियों , और बच्चे अपने , पिताओं की शकल देखने की कोशिश करते और नहीं मिलने पर उदास हो जाते थे। इसलिए जहाँ भी गाड़ी रोक कर ड्राइवर अनावश्यक देर करता , सारे मजदूर गाड़ी जल्दी खोलने के लिये हल्ला करते। पत्नी , बच्चों से मिलने की इच्छा ने उन्हें धैर्यहीन बना दिया था। लेकिन ड्राइवर , कन्डक्टर बदस्तूर बस चला रहे थे। हर स्टापेज पर मजदूरों को जानवर के समान हांका जा रहा था और वे हल्के विरोध के साथ बर्दास्त कर रहे थे।
कन्डक्टर के हर हमले के बाद कुछ मजदूर , सफेदपोशों की ओर मुँह करके बुरा – भला कर रहे थे लेकिन के सारे लोग चुप थे। उन्हीं में से एक सज्जन कह रहे थे कि तुमलोग कंडक्टर के बहशीपन का विरोध क्यों नहीं करते। तुम्हारे साथ अन्याय हो रहा है अन्याय के खिलाफ तो तुम्हीं को लड़ना है। बाहरी लोग मदद कर सकते हैं। तुम्हारी लड़ाई दूसरे नहीं लड़ सकते। लेकिन सफेदपोश की बात का असर पड़ नहीं रहा था।
थोड़ी देर बाद फिर बस रुकी। दो सफेदपोश फिर चढ़े। कन्डक्टर ने उनके लिए जगह बनाना शुरू किया। लेकिन इस बार दो मजदूरों ने सीट छोड़ने से इन्कार कर दिया। क्या हमने किराया नहीं दिया है ,, उन दोनों ने कहा।
उनके विरोध से कन्डक्टर कुछ क्षण हिचका , उसने मुँह घुमाकर बस में बैठे मुसाफिरों की ओर देखा। सारे मुसाफिर सफेदपोशों को छोड़कर उसे हिकारत की दृष्टि से देख रहे थे। कंडक्टर जोश में आकर उनसे हाथापाई करने लगा। दोनों मजदूर भी तुर्क व तुर्क जवाब देने लगे। बस में से भी मजदूरों के पक्ष में आवाज आने लगी। फिर तो कंडक्टर लजा कर मुँह नीचे किये हुये बस के दरवाजे से बाहर फुटबोर्ड पर लटक गया। कन्डक्टर फिर बस के अन्दर नहीं आया। और सफेदपोशों का चेहरा देखने लायक था।
उपर्युक्त यह कहानी परत – दर – परत पुस्तक लेखक सिद्वेश्वर नाथ पांडेय के द्वारा लिखी गई है। यह विकल्प – मीमांसा के संपादकीय सलाहकार भी रहे है। अब वह दिवंगत है।