ललित गर्ग।
विज्ञान और तकनीक ने मानव सभ्यता को अभूतपूर्व गति प्रदान की है। आज का युग डिजिटल युग है , जहां एक क्लिक पर पूरी दुनिया हमारी हथेली में सिमट आई है। स्मार्टफोन ने संचार , शिक्षा ,व्यापार बैंकिंग , स्वास्थ्य , शासन और सामाजिक संबंधों को नई दिशा दी है , लेकिन हर तकनीक क्रांति अपने साथ कुछ गंभीर चुनौतियां भी लेकर आती है। स्मार्टफोन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यह जितना बड़ा वरदान सिद्ध हुआ है , उतना ही बड़ा अभिशाप भी बनता जा रहा है। विशेष रूप से बच्चों और किशोरों पर इसके दुष्प्रभावों ने पूरी दुनिया को चिंतित कर दिया है। आज विश्वभर में यह स्वीकार किया जा रहा है कि स्मार्टफोन केवल एक उपकरण नहीं , बल्कि एक ऐसी शक्ति है , जिसका विवेकपूर्ण उपयोग आवश्यक है। दुर्भाग्यवश , विवेक और अनुशासन के अभाव में इसका नकरात्मक पक्ष अधिक मुखर हो रहा है। स्मार्टफोन की लत बच्चों और युवाओं में मानसिक तनाव , अवसाद , एकाकीपन हिंसक , प्रवृत्तियों ,अश्लीलता , साइबर अपराध और सामाजिक विघटन का कारण बन रही है। यही कारण है कि आज केवल परंपरागत समाज और विकासशील देश ही नहीं , बल्कि विकसित देश भी इस चुनौती से निपटने के लिए कठोर कदम उठा रहे हैं।
हाल ही में भारत के हरियाणा के नूंह जिले के सुखपुरी गांव की पहल ने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया। गांव की पहचान साइबर अपराध के केंद्र के रूप में बनने लगी थी। इससे आहत होकर ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से स्मार्टफोन त्यागने और बेसिक फोन अपनाने का निर्णय लिया। यह केवल मोबाइल तोड़ने की घटना नहीं , बल्कि समाज की उस पीड़ा की अभिव्यक्ति है , जो तकनीक के दुरुपयोग से पैदा हुई है। गांव के युवाओं का विरोध भी स्वाभाविक है , क्योंकि आज शिक्षा , रोजगार , डिजिटल भुगतान और सरकारी सेवाएं स्मार्टफोन पर निर्भर हैं। इस घटना ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा किया है – क्या समाधान तकनीक का बहिष्कार है या उसके विवेकपूर्ण उपयोग का संस्कार ? विश्व के अनेक देशों ने इस प्रश्न पर गंभीर चिंतन आंरभ कर दिया है। ऑस्ट्रेलिया , फ्रांस ब्रिटेन , नीदरलैड , चीन और अमेरिका जैसे देशों में बच्चों और किशोरों के स्मार्टफोन उपयोग को नियंत्रित करने की दिशा में अनेक पहलें हुई हैं। ऑस्ट्रेलिया ने किशोरों के सोशल मीडिया उपयोग पर आयु – सीमा तय करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। फ्रांस ने स्कूलों में स्मार्टफोन प्रतिबंध लागू किया है। ब्रिटेन में भी स्कूलों में मोबाइल उपयोग को सीमित करने के लिए दिशा – निर्देश जारी किए गए हैं। अमेरिका में सोशल मीडिया कंपनियों के विरुद्ध मुकदमे दायर हुए हैं और उन पर भारी जुर्माने लगाए गए हैं। इन पहलों का उद्देश्य तकनीक का विरोध नहीं , बल्कि बच्चों के मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य की रक्षा करना है।
वास्तव में स्मार्टफोन जहां वरदान है , वही अभिशाप भी है। इससे ज्ञान का भंडार भी उपलब्ध है और भ्रम का संसार भी। यह शिक्षा का माध्यम भी है और अश्लीलता तथा हिंसा का प्रवेश – द्वार भी। यह रोजगार के अवसर भी देता है और साइबर अपराध की राह भी खोलता है। आज अनेक युवा रातों – रात अमीर बनने की लालसा में साइबर ठगी ,और ऑनलाइन जुआ और डिजिटल धोखाघड़ी जैसे अपराधों में फंस रहे है। सोशल मीडिया पर फैल रही अश्लील सामग्री फेक न्यूज , नफरत और ट्रोल संस्कृति ने सामाजिक मूल्यों को गहरी चोट पहुंचाई है। सबसे अधिक चिंता का विषय बच्चोंऔर किशोरों का मानसिक स्वास्थ्य है। शोध बताते हैं कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम से बच्चों की एकाग्रता , स्मरण शक्ति और रचनात्मक क्षमता प्रभावित होती है। नींद में कमी , चिड़चिड़ापन अवसाद चिंता , आत्महत्या की प्रवृति और सामजिक अलगाव जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। परिवारों में संवाद कम हुआ है और डिजिटल निकटता के बावजूद भावनात्मक दूरियां बढ़ी हैं। बच्चे खेल के मैदानों से दूर होकर आभासी दुनिया में खोते जा रहे है।
विशेषत; स्मार्टफोन एक दुधारी तलवार है। आज कृत्रिम बुद्विमता और अत्याधुनिक संचार माध्यमों ने इस चुनौती को और अधिक जटिल बना दिया है। एआई जहां शिक्षा , चिकित्सा , अनुसंधान और प्रशासन के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ला रही है , वही इसके दुरुप्रयोग की आशकाएं भी तेजी से बढ़ रही हैं। डीपफेक वीडियो , फर्जी ऑडियो , साइबर ठगी , पहचान की चोरी , फेक न्यूज और डिजिटल ब्लैकमेल जैसे अपराधों में एआई का इस्तेमाल चिंताजनक स्तर तक बढ़ गया है।स्मार्टफोन इस पूरी प्रक्रिया का सबसे सुलभ और प्रभावी माध्यम बन गया है। एक साधारण मोबाइल फोन के माध्यम से आज कोई भी व्यक्ति एआई आधारित ऐप्लीकेशन का उपयोग कर नकली तस्वीरें और वीडियो तैयार कर सकता है। भ्रामक सूचनाएं फैला सकता है।
विशेष रूप से किशोर और युवा , जिनके पास तकनीक कौशल तो है लेकिन नैतिक प्रशिक्षण और परिपक्व्ता का अभाव है , वे अनजाने में अथवा त्वरित लाभ की लालसा में ऐसे कृत्यों में संलिप्त हो सकते हैं। इसलिए आवश्यक है कि एआई और स्मार्टफोन के उपयोग के साथ – साथ डिजिटल नैतिकता , मानवीय मूल्यों और कानूनी जिम्मेदारियों का भी समुचित प्रशिक्षण दिया जाए , ताकि तकनीक मानव के विकास का साधन बने , विनाश का नहीं। इस संदर्भ में यह कथन अत्यंत प्रासांगिक है – विज्ञान बिना विवेक के विनाश का कारण बनता है , जबकि विवेक के साथ वही विज्ञान मानवता का वरदान बन जाता है।
ऐसी स्थिति में भारत में भी व्यापक राष्टीय विमर्श की आवश्यकता है। भारत विश्व की सबसे युवा आबादी वाला देश है और एक विकसित राष्ट बनने की दिशा में तेजी से अग्रसर है। यदि भारत को विश्वगुरु के रूप में अपनी भूमिका निभानी
है ,तो उसे तकनीक और मानवीय मूल्यों के बीच संतुलन स्थापित करना होगा। भारत द्वारा निर्मित नीतियां न केवल देश , बल्कि विश्व के लिए भी मार्गदर्शक बन सकती हैं। इस दिशा में कुछ ठोस कदम उठाए जा सकते हैं – पहला, बच्चों और किशोरों के लिए स्मार्टफोन उपयोग की आयु – सीमा और समय – सीमा निर्धारित की जाए। एक निश्चित आयु तक बच्चों को केवल आवश्यक और नियंत्रित डिजिटल सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।
दूसरा स्कूलों में साइबर साक्षरता और डिजिटल नैतिकता को पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाए। बच्चों को केवल तकनीक का उपयोग ही नहीं , बल्कि उसके दुष्पपरिणामों और कानूनी पहलुओं की जानकारी भी दी जानी चाहिए।
नोट – यह आर्टिकल केवल जागरूकता के लिये है इस आर्टिकल का उद्देश्य किसी की भावनाओं को आहत करना नहीं है