ज्योतिर्लिंग का पुराणकालीन वैधनाथ मंदिर

 

मीमांसा डेस्क।

द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक वैद्यनाथ मन्दिर ज्योतिर्लिंग का पुराणकालीन मन्दिर है जो भारतवर्ष के राज्य झारखंड में अतिप्रसिद्व देवधर नामक स्थान पर स्थित है। देवधर झारखंड राज्य का एक जिला भी है। पवित्र तीर्थ होने के कारण लोग इसे वैद्यनाथ धाम भी कहते हैं। जहाँ यह मन्दिर स्थित है उस स्थान को देवधर अर्थात देवताओ का घर कहते हैं , क्योंकि भगवान शिव देवों के देव है तथा वैद्यनाथ मंदिर भगवान शिव का मंदिर है , जहां देवो के देव देवाधिदेव वास करते हों वहां बाकी सारे देवता तो आयेंगे ही। इसीलिये यह स्थान देवधर कहलाता है। यह ज्योतिर्लिंग एक सिद्धपीठ है। कहा जाता है कि यहाँ पर आने वालों की सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इस कारण इस लिंग को कामना लिंग भी कहा जाता है।
सावन महीना भोलेनाथ के भक्तों के लिये पर्व के महीने की तरह आता है। इस पवित्र मास की शुरुवात होते ही बिहार , झारखंड तथा आसपास के राज्य के हिन्दु भक्तों के बीच बाबा बैद्यनाथ मंदिर देवधर जाने की होड़ लग जाती है। भागलपुर के पास स्थित सुल्तानगंज से देवधर स्थित वैद्यनाथ मंदिर की दूरी लगभग 105 किलोमीटर है लेकिन बोल बम -बोल के जयघोष के साथ पूरा एक महीना ऐसा लगता है जैसे उस 105 किलो मीटर की दूरी में हरेक जगह कांवड़ लिये कांवड़िये तथा डाक बम कावड़िये के बीच मानो होड़ लगी हो कि जल्द से जल्द बाबा भोलेनाथ के दर्शन हो जाये तथा जीवन सार्थक हो जाये।
बिहार तथा झारखंड सरकार की ओर से भी इस एक माह तक उचित सरकारी व्यवस्था की जाती है ताकि रास्ते में किसी भी कावड़ियों व तीर्थयात्रियों को किसी भी तरह की कोई परेशानी न हो। सबकी एक अभिलाषा होती है कि जीवन में एकबार बाबा वैद्य नाथ मंदिर में जल चढ़ाना है तथा भोले बाबा के दर्शन करना है।

स्थापना की कथा

इस लिंग की स्थापना का इतिहास यह है कि जनश्रुति के अनुसार एक बार राक्षसराज रावण ने हिमालय पर जाकर शिवजी की प्रसनन्ता के लिये घोर तपस्या की और अपने सिर काट – काटकर शिवलिंग पर चढ़ाने शुरू कर दिये। एक – एक करके नौ सिर चढ़ाने के बाद दसवाँ सिर भी काटने को ही था कि शिवजी प्रसन्न होकर प्रकट हो गये।उन्होंने उसके दसों सिर ज्यों के त्यों कर दिये और उससे वरदान माँगने को कहा। रावण ने लंका में जाकर उस लिंग को स्थापित करने के लिये उसे ले जाने की आज्ञा मांगी। शिवजी ठहरे अवधरदानी इसलिये अनुमति दे दी , पर इस चेतावनी के साथ दी कि यदि मार्ग में इसे पृथ्वी पर रख देगा तो वह वहीं अचल हो जाएगा। अन्ततोगत्वा वही हुआ। रावण शिवलिंग लेकर चला पर मार्ग में एक चिंताभूमि आने पर उसे लघुशंका निवृति की आवश्यकता हुई। रावण उस लिंग को एक मुसाफिर को थमा लघुशंका – निवृति करने चला गया। इधर उस मुसाफिर को भी दैवयोग से वह लिंग इतना भारी लगा कि उसे सभांल नहीं सका तथा रावण के आने से पहले ही उस लिंग को धरती पर रखकर कहीं चला गया। लौटने पर रावण पूरी शक्ति लगाकर भी उसे न उखाड़ सका और निराश होकर मूर्ति पर अपना अंगूठा गड़ाकर लंका को चला गया। इधर ब्रम्हा , विष्णु आदि देवताओं ने आकर उस शिवलिंग की पूजा की। शिवजी के दर्शन होते ही सभी देवी – देवताओं ने शिवलिंग की वहीं उसी स्थान पर प्रतिस्थापना कर दी और शिव – स्तुति करते हुए वापस स्वर्ग को चले गये। जनश्रुति व लोक मान्यता के अनुसार यह वैद्यनाथ – ज्योतिर्लिंग मनोवांछित फल देने वाला है।

मन्दिर के मुख्य आकर्षण

देवधर का शाब्दिक अर्थ है देवी – देवताओं का निवास स्थान। देवधर में बाबा भोलेनाथ का अत्यंत पवित्र और भव्य मन्दिर स्थित है। हर साल सावन के महीने में श्रावण मेला लगता है जिसमें लाखों श्रद्वालु बोल – बम बोल – बम का जयकारा लगाते हुए बाबा भोलेनाथ के दर्शन करने आते है। ये सभी श्रद्धालु सुल्तानगंज से पवित्र गंगा लेकर लगभग 105 किलोमीटर की अत्यंत कठिन पैदल यात्रा कर बाबा को जल चढ़ाते हैं। दो तरह के कांवड़िये होते हैं। एक वो जो जल को लेकर २-3 दिनों में विश्राम करते हुये बाबा के मंदिर में जल चढ़ाते हैं लेकिन इस बात का खास ध्यान रखा जाता है कि वो कांवड़ जमीन पर कहीं भी नहीं छुने पाये अन्यथा उसकी यात्रा निश्फल मानी जाती है तथा दूसरे प्रकार के भक्त वो होते हैं जिन्हे डाक बम कहा जाता है। इस प्रकार के कांवड़िये एक बार सुल्तान गंज से जल लेकर बिना कही रुके 24 घंटे के अंदर ही वैद्यनाथ मंदिर जाकर बाबा भोलेनाथ के उपर जलाभिषेक करते हैं।
मन्दिर के समीप ही एक विशाल तालाब भी स्थित है। बाबा बैद्यनाथ का मुख्य मन्दिर सबसे पुराना है जिसके आसपास अनेक अन्य मन्दिर भी बने हुए हैं। बाबा भोलेनाथ का मन्दिर माँ पार्वती जी के मन्दिर से जुड़ा है।

पवित्र यात्रा

बैद्यनाथ धाम की पवित्र यात्रा श्रावण मास जुलाई – अगस्त में शुरू होती है जो कि पूरे एक माह तक चलती है। सबसे पहले तीर्थ यात्री सुल्तानगंज में एकत्र होते हैं जहाँ वे अपने – अपने पात्रों में पवित्र गंगाजल भरते है। इसके बाद वे गंगाजल को अपने – अपने कांवड़ में रखकर बैद्यनाथ धाम और बासुकीनाथ की ओर बढ़ते है। पवित्र जल लेकर जाते समय इस बात का ध्यान रखा जाता है कि वह पात्र जिसमें जल है , वह कहीं भी भूमि से न सटे।

बैजू मन्दिर

बाबा बैद्यनाथ मन्दिर परसिर के पश्चिम में देवधर के मुख्य बाजार में तीन और मन्दिर भी हैं। इन्हें बैजू मन्दिर के नाम से जाना जाता है। इन मन्दिरो का निर्माण बाबा बैद्यनाथ मन्दिर के मुख्य पुजारी के वंशजों किसी जमाने में करवाया था। प्रत्येक मन्दिर में भगवान शिव का लिंग स्थापित है। जनश्रुति के अनुसार रावण के लंका जाने के पश्चात सभी देवी – देवता आकर भगवान शिव की पूजा अर्चना करने के पश्चात स्वर्ग सिधार गये तथा वह जगह विरान हो गया। एक दिन एक चरवाहा जिसका नाम बैजू था उसी जगह पर अपने जानवरों को चरा रहा था जहाँ भगवान शिव ने उसे दर्शन दिये। अपने घर जाकर बैजू ने सबको यह बात बतायी तथा उसी दिन से वहां पर पूजा अर्चना करने लगा। घोर लग्न व परिश्रम से वहां एक भव्य मंदिर की स्थापना हो गयी। पहले इस मंदिर का नाम बैजुनाथ उसी चरवाहे के नाम पर था लेकिन कालांतर में
वैद्यनाथधाम हो गया।

वासुकिनाथ मन्दिर

वासुकिनाथ अपने शिव मन्दिर के लिये जाना जाता है। वैद्यनाथ मन्दिर की यात्रा तब तक अधूरी मानी जाती है जब तक वासुकिनाथ में दर्शन नहीं किये जाते। यह मन्दिर देवधर से 42 किलोमीटर दूर जरमुण्डी गाँव के पास स्थित है। यहाँ पर स्थानीय कला के विभिन्न रूपों को देखा जा सकता है। वासुकिनाथ मन्दिर परिसर में कई अन्य छोटे – छोटे मन्दिर भी है।