झूठ का झंडा ,

 

जिस दिनों , मैं विधार्थी हुआ करता था , उन दिनों ,अपने मनोरंजन खर्च के लिये पैसे की उगाही पिता जी से झूठ बोलकर किया करता था। हालाँकि बाद में , माँ से मालूम हुआ कि तुम्हारा झूठ बोलना पिता जी जानते थे , फिर भी बेटे के हाथों ठगाना अच्छा लगता था। पंडित जी आँख बंद कर बीते दिनों की जुगाली कर रहे थे।

पंडित जी , जानवरों का जब पेट भर जाता है तब वे बैठकर जुगाली करता है। मनुष्य जब बुढ़ा हो जाता है तब वह अपने बीते दिनों की उपलब्धियों की जुगाली करता है , जैसे आप अभी कर रहे हैं। अरे राजनैतिक क्षितिज पर जो घटनायें घट रही हैं ,उनकी चर्चा कीजिये। पेट्रौल , डिजल का फिर दाम बढ़ा दिया गया। सरकार कहती है कि तेल पुल में घाटा हो रहा है ; इसलिये पेट्रोल , डिजल का दाम बढ़ाया गया है। आखिर सच क्या है ?

आशुतोष बाबू , ऊपर की कहानी उसी सन्दर्भ में तो है। सरकार वही कर रही है जो हम लकड़पन में किया करते थे। उस समय बाप बेवकूफ अपने आनन्द के लिये बनता था। उसमें बाप ठगा कर खुश होता था। इसमें जनता जार – जार बेहाल है।

डिजल पैट्रोल , किरासन उत्पादन नहीं होता। इसलिये सरकार विदेश से तेल खरीदती थी। सरकार कहती है कि वह सब्सीडी देकर आम जनता को मुहैया कराती है। उसी सब्सीडी को सरकार घाटे के रूप में प्रचारित करती है , उसी सरकारी प्रचार को तेल पुल घाटा कहा जाता है।

तब तो सरकार सच ही कहती है – आशुतोष बाबू बोले।

सरकार क्या कहती है यह मैं नहीं जानता। सरकार करती क्या है ? यह मैं अवश्य जानता हूँ। जरूरत के साठ प्रतिशत तेल भारत सरकार स्वयं उत्पादित करती है। चालिस प्रतिशत तेल बाहर से खरीदना पड़ता है। स्व. राजीव गाँधी कहा करते थे कि उक्त तेल घाटे की पूर्ति गल्फ देश से आने वाले पैसे से भरपाई हो जाती थी। ,,

सरकार ने कभी भी कोशिश नहीं की कि चालिस प्रतिशत घाटे की पूर्ति के लिये कुछ उद्यम किया जाता। तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग को बढ़ावा न देकर भारतीय स्तोत्र को ही निजी हाथों में सौंपने की साजिश की जा रही है।स्वाबलम्वन के लिये यह तरीका भी है कि निजी वाहनों के उत्पादन पर रोक लगा दी जाती। छोटी गाड़ियों , स्कूटरों मोटर – साइकिलों के उत्पादन पर रोक लगती। बसों तथा ट्रकों का उपयोग होता। तब सम्भव होता कि तथा कथित जो तेल पुल का घाटा है , वह नहीं होता।

पंडित जी बात तो आप लगने वाली कह रहे हैं। तेल का इतना घाटा था , तब छोटी गाड़ियों के उत्पादन की क्याआवश्यकता थी।
आशुतोष बाबू बोले।

लेकिन सच वह नहीं है जो सरकार कहती है। आशुतोष बाबू आपको याद होगा कि पिछले बजट के पहले अंतराष्टीय बाजार में तेल का भाव 12  डालर प्रति बैरल था। मतलब ३.44 रु प्रतिलीटर। सरकार पेट्रोल बेचती थी 28 रुपए प्रति लीटर। अब पैट्रोल का मूल्य २5 डालर प्रति बैरल हो गया है। अर्थात 7 .15 रु प्रति लीटर।

एक प्रश्न उठ सकता है कि 7 .15 रु प्रति लीटर क्रूड तेल सरकार खरीद रही है , मान लिया कि क्रूड तेल को साफ करने , ट्रांसप्रोटेशन स्थापना , मुनाफा आदि मिलाकर 7 .5 रूपये प्रति लीटर। सरकार बेच रही है 30 रु प्रति लीटर पेट्रौल । फिर भी सरकार घाटे की बात कर रही है।

अगर डिजल , किरासन तेल , पेट्रौल की कीमत का भी औसत ले तो वह भी 1950 पड़ता है अर्थात लागत से 4 .50 पैसे प्रति लीटर अधिक।
इस तरह सरकार पेट्रौल , डिजल , किरासन तेल की कीमत अधिक लेती है लेकिन रोना घाटे का करके तेलों की कीमत बढ़ा रही है। आशुतोष बाबू पंडित जी का मुँह देखते रह गये।

उपर्युक्त यह कहानी परत – दर – परत पुस्तक लेखक सिद्वेश्वर नाथ पांडेय के द्वारा लिखी गई है। यह विकल्प – मीमांसा के संपादकीय सलाहकार भी रहे है। अब वह दिवंगत है।