सुखवन

 

यह कहानी मेरी नानी कहती थी। वह यही कहती थी कि वह इस कहानी उसने अपनी नानी से सुनी थी। उसकी नानी भी कहीं से सुनी होगी। कल मेरा नाती भी यही कहेगा कि उसने यह कहानी अपने नाना से सुनी थी।
एक था राजा। उसके दरबार में बहुत से मुसाहिब भी थे , मुसाहिबों से बातचीत के दरमियान एक साहिब ने सवाल उठाया। हुजूर खजाने में मुद्द्त से अशर्फियाँ रखी हुई हैं।
उन्हें धूप लगाना आवश्यक है अन्यथा सीलन से सभी अशर्फियाँ खराब हो जायेंगी सारे दरबारियों ने हाँ में हाँ मिलाई। राजा ने भी सहमति में सर हिला दिया। खजांची ने विरोध किया लेकिन राजाज्ञा सर्वोपरि है। खजांची ने तौल कर , राज महल के छत , पर मुसाहिबों के रक्षण में अशर्फियां सुखने के लिये डाल दिया गया।
दिनभर सुखने के बाद शाम को अशर्फियाँ खजाने में लायी गयी। खजांची ने तौला अशर्फियाँ कम थी। उसने राजा को सूचना दी , हुजूर वजन करके अशर्फियाँ भेजी गयी थी। लौटने पर वजन कम है। राजा ने दरबारियों को तलब किया। सारे दरबारियों के मुँह सुख गये। उन्हें खजांची पर गुस्सा आ रहा था। कमबख्त को हिस्सा दिया था , तब क्यों उसने शिकायत की। सारे लोगों की बोलती बंद। इधर राजा जी का गुस्सा आसमान पर चढ़ा जा रहा था।

दरबारियों को लगा कि अब उन्हें फाँसी या देश निकाला होगा ही। एकाएक राजा का तलबगार दरबारियों को ओर देखते बोल उठा – हुजूर सुखवन चला गया होगा। गेहूँ चावल सुखाने पर वजन कम हो जाता है। राजा को तलबगार का जवाब अच्छा लगा। उसका गुस्सा ठंढ़ा हुआ। दरवारियों की टंगी साँसे नीचे आई – तलबगार भी लूट का हिस्सेदार हो गया।
पंडित जी कोई कामधाम नहीं है। बेकार बैठकर कहानियाँ गढ़ते रहते हैं। यह सब निकम्मों का काम है। बेकार की कहानी का आपका मकसद क्या है ?
आशुतोष बाबू आप अखबार पढ़ते हैं ?
नहीं। मेरे बदले में आप पढ़ते हैं।
नाराज मत होईये। ब्रिटेन के रेल के संबंध में जो खबर छपी थी , वह पढ़े थे।
नहीं
इसीलिये कह रहे हैं – अखबार ने लिखा – अंतराष्टीय मुद्राकोष एवं विश्व बैंक के इशारे पर अर्जेटाइना और ब्राजील चले। दोनों देश दिवालिया हो गये।
ब्रिटेन भी उन्हीं के इशारे पर चला – ब्रिटेन के सरकारी रेल को ट्रैक नामधारी निजी कम्पनी के हाथों 1996 में बेंच दिया था।
ठीक किया था। टिकट कटाना नहीं , रेल पर चढ़ना है – रेल को घाटा होगा ही आखिर कितना घाटा सरकार सहे – बेंच दिया।
आशुतोष बाबू – ईगलैंड में शायद ही कोई बिना टिकट चलता है।
तब घाटा कैसे होता है ?
इस पर फिर कभी – यही सरकार रेल पर 9 महीना पूर्व रिसीवर बैठा चुकी है। ब्रिटेन के परिवहन मंत्री ने 28 जून 2002 को प्रतिनिधि सदन में बताया कि रेल ट्रैक कम्पनी दिवालिया हो गयी है। शर्म शब्द का इस्तेमाल नहीं करके , इसे गैर मुनाफा चालित कम्पनी को सौंपा जायेगा।
मतलब रेल को फिर से राष्टीयकरण किया जायेगा।
समझने की बात है निजी कम्पनी बिना मुनाफे के क्यों काम करेगी ?
लेकिन इन सबसे आपकी कहानी का क्या संबंध है।
– हैं इसीलिये तो कह रहा हूँ। रेल की फिर से पटरी पर लाने में सरकार को 21 लाख डॉलर की जरूरत होगी। सरकार से निजी फिर निजी से सरकारी करने में जनता का 21 लाख का सुखवन गया अथवा नहीं।
पूंजीवादी व्यवस्था के पोषक , पूंजीपतियों के जर खरीद गुलाम हैं – छी; – आशुतोष बाबू बोले।

उपर्युक्त यह कहानी परत – दर – परत पुस्तक लेखक सिद्वेश्वर नाथ पांडेय के द्वारा लिखी गई है। यह विकल्प – मीमांसा के संपादकीय सलाहकार भी रहे है। अब वह दिवंगत है।