वाह साहब इतिहास के पाठ्य पुस्तकों में थोड़ी सी रद्दो बदल क्या कर दी – हंगामा शुरू हो गया। इतिहास है क्या ? जो जीता वो सिकंदर। सिकन्दरों के जीत का इतिहास – सिकंदरों के मन मुताबिक लिखा जाता रहा है। पौराणिक आख्यानों से लेकर आज तक का इतिहास उलट कर देख लीजिये। बसुंधरा वीर – भोग्या होती है।
आजादी के लड़ाई को ही लीजिये। कांग्रेस के नेतृत्व में लड़ी गयी। जबकि कांग्रेस की स्थापना , ह्यूम साहब ने अंग्रेज सरकार की चमचाबाजी के लिये , की थी। गांधी जी ने उसका उपयोग अंग्रेजों के खिलाफ किया। उस लड़ाई में सैकड़ों नहीं – लाखों लोगों ने कुर्बानियाँ दी। देश आजाद हुआ। आजादी के बाद लिखे गये इतिहास के किसी पन्ने में उनका नाम छपा।
जला अस्थियाँ बारी – बारी। सुलगाई जिसने चिंगारी ,
उसका कहीं नाम है ? आजादी की लड़ाई के अमर पात्र सिर्फ गांधी , नेहरू और कांग्रेसी रहे। क्योंकि सत्ता उनके हाथ में थी।
इंदिरा जी के समय चारणों ने नारा लगाया इंडिया इज इन्दिरा इन्दिरा ही भारत है कहीं विरोध का सशक्त स्वर नहीं उठा। उठा भी तो कुचल दिया गया। इतिहास उलट कर देख जाइये , कहीं हाशिये में भी धरहु या उनके औलादों की चर्चा है। दिल्ली के तख्त पर अंतिम हिन्दू राजा हेमू बैठा। मात्र 27 दिनों के बाद ही बैरम खाँ के साथ हुए युद्व में मारा गया।
हेमू की सेना के साथ सवर्णो ने गद्दारी की क्योंकि हेमू बनिया का बेटा था। जगलाल चौधरी , 1942 में अंग्रेजों भारत छोड़ो आन्दोलन के लिये सारण जिले के डिक्टेटर नियुक्त किये गये थे। अंग्रेजों ने उनके लड़के को गोली मार दी और उसकी लाश को तीन दिनों तक थाने में रखी गयी ताकि बेटे का मुँह देखने जगलाल चौधरी आयेंगे तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया जायेगा।
उन्होंने कहा कि आजादी के लिये लाखों बेटों को कुर्बान कर सकता हूँ। वहीं इतिहास में उनका नाम है। अगर हाशिये में कहीं है भी , तो कोई नाम लेवा नहीं। नाम उनका है जो स्वयं को गैर – राजनैतिक कहकर अंग्रेजो की आरती उतार रहे थे।
चन्द्रशेखर , भगत सिंह का नाम , इतिहासकारों के चलते नहीं , उनके सहयोगियों के लिखित दस्तावेज के चलते है।
अनादि काल से इतिहास शासक लिखवाते चले आ रहे हैं। चारण इसी लिये जन्म लेते ही हैं। अंग्रेजों ने भी वही किया।
चारणों से इतिहास को मार्क्स ने मुक्त किया। इतिहास के लिए उन्होंने वैज्ञानिक सोच दी। इतिहास को राजा रानी से हटाकर आम अवाम की ओर लाये। इतिहास लिखने की दृष्टि दी। उसी दृष्टि की मान्यता पूरी दुनिया में रही है।
मैं इतिहास के इस ढंग की मान्यता नहीं दूंगा। गद्दी पर मैं बैठा हूँ। इतिहास मेरे मुताबिक लिखा जायेगा। हिटलर मेरा आराध्य था और है भी। गोयबल्स हिटलर का प्रचार मंत्री था। हम उसी के बताये रास्ते पर चल रहे हैं और औरों को भी ले चलेंगे। रामशरण शर्मा , रोमिला थापरों की ऐसी की तैसी। हम नहीं जानते साक्ष्य , पुरातत्व। रामशरण जी कहते हैं कि ईशा से पूर्व का कोई साक्ष्य आदम जात का , अयोध्या की खुदाई में , अब तक नहीं मिला जिससे इतिहासकार राम जन्म भूमि की घोषणा कर सकें।
साक्ष्य नहीं मिला तो न मिले ; हमारे पास तो अंग्रेज महिला का साक्ष्य है जो लिखती है कि कभी राम जन्म भूमि रहा होगा। हमारी मर्जी , हमारे मन लायक होगा उसे मानेंगे नहीं तो नहीं। वैसे हम अंग्रेजों से ज्यादा उसके पहले वाले शासकों के खिलाफ हैं। इसी लिये हम अंग्रेजों तथा हिटलर के खिलाफ नहीं बोलते।
हम इतिहास वैसा ही लिखवायेंगे , जैसा चाहेंगे , आर्यभट या कोरनिकस लाख कहते रहें कि पृथ्वी चलती है। लेकिन मेरे पूर्वजों ने वेदों में लिखा है कि पृथ्वी अचला है इसलिये पृथ्वी अचला है। सरति आकाशे इति सूर्य्य ; जो आकाश में विचरण करता है वही सूर्य है। मैं विज्ञान का विधार्थी रहा हूँ। विज्ञान पढ़ाता हूँ।
बच्चों को कहता हूँ कि पृथ्वी और सूर्य के बीच में चंद्रमा आता है तो ग्रहण होता है। लेकिन मेरे धर्म की किताब में लिखा है कि चंद्रमा – सूर्य को राहु ग्रस्ता है तो ग्रहण लगता है। मैं विज्ञान के किताब में यही लिखवाऊंगा। बच्चों को वही पढ़ाऊंगा जो मेरी मान्यता होगी। पूर्व में पांचजन्य का स्वतंत्रता विशेषांक निकला था। सबका वर्णन उसमें था लेकिन राम प्रसाद विस्मिल के अनन्य मित्र अशफाकुल्लाह खान का नाम नहीं था। क्योंकि हमारा मोटो या सिद्धान्त यही है।
इतिहास वह नहीं जो साक्ष्य कहता है इतिहास वह है जो मैं कहता हूँ।
उपर्युक्त यह कहानी परत – दर – परत पुस्तक लेखक सिद्वेश्वर नाथ पांडेय के द्वारा लिखी गई है। यह विकल्प – मीमांसा के संपादकीय सलाहकार भी रहे है। अब वह दिवंगत है।
उपर्युक्त यह कहानी परत – दर – परत पुस्तक लेखक सिद्वेश्वर नाथ पांडेय के द्वारा लिखी गई है। यह विकल्प – मीमांसा के संपादकीय सलाहकार भी रहे है। अब वह दिवंगत है।