कुछ दल होते ऐसे हैं जो हर सरकार की सिर्फ शिकायत ही शिकायत करते रहते हैं। भूल से भी तारीफ नहीं करते। विपक्षी पार्टियाँ और चन्द्रशेखर जी में अच्छे रिश्ते हैं । जैसे चन्द्रशेखर को किसी ने हँसते हुए नहीं देखा , उसी तरह विपक्षी दल सरकार के अच्छे कार्यो की भी तारीफ करते नहीं देखा।
विपक्षियों ने जवाहर लाल जी को बहुत तंग किया। प्रतिक्रिया स्वरूप वे स्वयं तो नहीं लेकिन कुछ समाजवादी , कांग्रेसी जरूर हो गये।
इंदिराजी ने तो सविंधान में ही समाजवाद जोड़वा दिया जो आज तक बदस्तूर लागू है। उसे अब तक बदला नहीं गया। श्रीमती गांधी ने समाजवादियों से दो कदम आगे बढ़कर गरीबी का हल्ला उठाया। गरीबी क्या हटती – गरीब को ही हटाना शुरू कर दिया। इंदिरा जी के बाद तो कोई समाजवाद या गरीब का नाम लेने वाला भी नहीं है।
विपक्षी अब फिर से उस शब्द को बाजार में लाना चाहते हैं। लेकिन पहले की सरकार और इस सरकार में अंतर है। पहले वाले इस चक्कर में रहते थे कि किसी तरह से गद्दी बरकरार रहे। इस बार तो स्पष्ट सोच वाली सरकार है जो घोषित रूप से हिन्दी , हिन्दू हिन्दुस्तान की वकालत करती है।
कुछ पुराने अंधे , जो कल तक गद्दी के लिये , स्पष्ठ सोच वाली पार्टी को गाली देते अघाते नहीं थे। वही सत्तासुख के लिए , उस पार्टी के प्रवक्ता बने बैठे हैं। उनका भी दोष नहीं है। कितने दिनों तक त्याग , तपस्या में जिंदगी बर्वाद करें। जवानी तो चली ही गयी , बुढ़ापे में कुछ तो सत्ता भोग का मजा लिया जाय। इसलिये पाला बदलना पड़ा।
आज से 30 – 35 वर्ष पूर्व नारा लगता था अटल विहारी बोल रहा है ,ग्यारह कनवाँ तौल रहा है। अब वही ग्यारह कनवाँ वाले गद्दी पर बैठे हैं। स्वभाविक है वो उन्हीं की हित की बातें करेंगे। इस मामले में वे लोग इमानदार भी हैं। और इस तरह की इमानदार सरकार मिलेगी कहाँ। भाड़ में जाये अमीर – गरीब।
सूबा बिहार की ही लीजिये। गरीबी है। बेरोजगारी है। भूख है। जनता बेहाल है। भूख से सिर्फ बिहार ही नहीं और भी राज्य पस्त हैं। भूख का सपना दिखाकर मौजूदा सरकार गद्दी पर जमी हुई है। शायद ही इतनी गरीबी तथा मजदूर विरोधी सरकार यहाँ बैठी हो। लेकिन इस निक्कमी सरकार का भी विरोध करने वाला कोई नहीं है।
विपक्षी दल के नेता को सपने में भी गरीबों के दर्शन नहीं होते। लगातार षड्यंत्र के तहत मौजूदा सरकार को लाइम लाइट में रखे हुए हैं। उस बेचारे की नजर सिर्फ गद्दी पर है। इसी गद्दी के लिये बिहार दो हिस्से में बांटा गया। देखें देश कब बटता है।
इतिहास साक्षी है , इंदिरा गांधी जैसी दबंग नेता के खिलाफ आंदोलन छेड़ा गया। इंदिरा जी के धूल में मिल गयी थीं। उसी आंदोलन के छाड़न ,, अभी गद्दी पर बैठे है। अंत ; यहाँ विरोध – विरोध का खेल चल रहा है।
भारत की जनता , बम्पर फसल के बाद भी भूखे मरने को वाध्य हैं। भूख उनकी नियति बन गयी है। अन्न रखने की जगह भारत सरकार के पास नहीं है। अरबों – खरबों टन गेहूँ सड़ रहा है। उस गेहूँ को अब जानवर भी नहीं खा सकते।
गेहूँ सड़े – तो सड़े , लेकिन कम कीमत पर बाजार में नहीं भेजेंगे। आखिर वे जनता के प्रति नहीं अपने समर्थक के प्रति जवाबदेही हैं।
कम कीमत पर बाजार में गेहूँ भेजेंगे तो व्यापारियों का दिवाला निकल जायेगा। जन वितरण प्रणाली की दूकान पर कम कीमत वाली गेहूँ को छोड़कर व्यापारियों का गेहूँ कौन खरीदेगा। इसलिये सरकार गेहूँ सड़ा रहीं है।
अन्न बर्वाद होता है तो हो , जनता भूखे मरती है तो मरे कमबख्त लेकिन सरकार अपने समर्थकों के हितों पर आँच नहीं आने देगी।
उपर्युक्त यह कहानी परत – दर – परत पुस्तक लेखक सिद्वेश्वर नाथ पांडेय के द्वारा लिखी गई है। यह विकल्प – मीमांसा के संपादकीय सलाहकार भी रहे है। अब वह दिवंगत है।