व्यापारी

 

राजा विक्रमादित्य जैसे ही वैताल को कंधे पर लादकर चला , वैताल बोल उठा – विक्रम कहानी सुन और जवाब दे ; अगर जानबूझकर जवाब नहीं दिया तो तेरे सर टुकड़े – टुकड़े हो जायेंगे और बोला तो मैं वापस पेड़ पर लटक जाऊंगा – वैताल ने कहानी शुरू कि –
धारा नगरी का वैभव नष्ट हो चुका था। बचे हुए अवशेष पर राजा अश्वघोष राज कर रहे थे। राजकाज चलाने के लिये पैसे की काफी तंगी थी। बाहरी खतरा भी मंडरा रहा था।
इसलिये उन सभी खतरों से बचाव के लिये एकमात्र उपाय , कर बढ़ाना ही रह गया था। जनता पर पहले से ही कर काफी था इसलिये जनता अन्दर से सुलग रही थी लेकिन उसे कोई दिशा नहीं मिल रहा था।

इसी बीच दूर देश का व्यापारी धारा नगरी में व्यापार के लिये आया। वह व्यापारी मंत्री से मिला। मंत्री ने असमर्थता जतायी। व्यापारी ने कहा कि असमर्थता का कारण क्या है ? मंत्री ने स्प्ष्ट बातें तो नहीं की , लेकिन वह मंत्री का इशारा समझ गया।

उस बार तो व्यापारी लौट गया लेकिन अगली बार से वह जब भी आता उपहार लेकर आता। उपहार मंत्रियो और राजाओं के बीच बारबार बांट देता था। राजा को भी कीमती उपहार देता था। धीरे – धीरे राजा और मंत्री उसके पक्षधर हो गये। लेकिन जनता के डर से व्यापारी के साथ कुछ
समझौता नहीं कर पा रहे थे। उन्होंने व्यापारी से अपनी झिझक बतायी। व्यापारी ने उनसे इजाजत मांगकर सांस्कृतिक आदान – प्रदान के तहत शिक्षा में विकास का कार्य आरम्भ करने की शुरुवात की।

शिक्षा के विकास की बात सुनकर राजा खुश हुये। इस उदारता का प्रभाव ऐसा पड़ा कि मंत्री और पदाघिकारी अपने रिश्तेदारों और परिचितों को धड़ल्ले से व्यापारी के देश में शिक्षा हेतु भेजने लगे।

परिणाम हुआ कि धारा नगरी की सांस्कृतिक चेतना , जो अलग – बगल के नगरों के लिये ईर्ष्या का सबब था , में परिवर्त्तन होने लगा। अभिजात्य वर्ग , व्यापारी देश के द्वारा प्रदत वस्तुओं का उपभोग करने के आदी होने लगे। आदी होने के बाद अब , उन वस्तुओं के आयात के लिये आम जनों के बीच प्रचार करने लगे।

चूँकि राजा खुद ही उन वस्तुओं का आदी हो चुका था इसलिये वह भी देशी वस्तुओं से उबने लगा और अन्तत; व्यापारी की बातों में आकर उन वस्तुओं के आयात के लिये आदेश दे दिया। उन वस्तुओं के आयात से धारा नगरी में पैदा होने वाली वस्तुओं की खपत कम होने लगी। परिणाम हुआ कि देशी उद्योग धंधे बंद होने लगे।

अब व्यापारी ने अपना असली चेहरा दिखलाना शुरू किया। यह देश की तरक्की के लिये सुझाव छोड़कर आदेश देने की धृष्ट करने लगा। धीरे – धीरे उनके राज – काज पर नजर फेरने लगा। व्यापारी इतना मजबूत हो गया कि अब वह अपने मन – मुताबिक व्यक्ति को मंत्री और राजा भी बनाने लगा।
बैताल ने राजा विक्रमादित्य से पूछा – ,,, बताओ – राजा व्यापारी के संकेत पर चलने लगा , इसमें दोष किसका हैं और व्यापारी के चंगुल से निकलने   का उपाय क्या है ?
विक्रम ने कहा कि मेहनतकश मजदूर जनता और बुद्धिजीवियों के सोये रहने से ही लुटेरों की दाल गलती है। देश की देशभक्त मिहनतक़श जनता संघर्ष तेज करके व्यापारी के हाथ बिके राजा , मंत्री से छुटकारा पायेगी। और तभी व्यापारी भागेगा।
इतना सुनते ही बैताल डाल पर उलटा लटक गया।

उपर्युक्त कहानी विकल्प मीमांसा के संपादकीय सलाहकार रहे सिद्वेश्वर नाथ पांडेय द्वारा लिखी गई है। अब वह दिवंगत हैं।