आशुतोष बाबू फिल्म देखते हैं।
पहले देखता था , अब नहीं।
तब तो राजकपूर की फिल्म आवारा को जरूर ही देखी होगी।
निःसन्देह , दो तीन बार।
तो बताइये उस फिल्म का फिल्मकार कहना क्या चाहा।
यही कि कुल खानदान में जन्म लेने से ही कोई अपराधी नहीं बनता बल्कि जिस माहौल में पलता है , अपराधी की पैदाइश वहीं होती है। इस थीम को अन्तरराष्ट्रीय ख्याति मिली।
इस फिल्म ने राजकपूर को रूस में नेहरू से ज्यादा लोकप्रिय बना दिया। सारे रूसियों को हिन्दी नहीं आती थी फिर भी हर भारतीय को देख कर वे आवारा हूँ अवश्य गाते थे। ,
लेकिन आशुतोष बाबू कभी – कभी मेरे मन में यह प्रश्न उठता है कि हर सिद्वान्त की तरह इस सिद्वान्त का भी कुछ अपवाद तो अवश्य ही होना चाहिये। विश्व इतिहास का ज्ञाता मेरे मित्र कहा करते हैं कि अमेरिका की खोज कोलम्बस ने की।
अमेरिका की खोज होते ही यूरोप के सारे अपराधी अपराध करके अमेरिका भाग जाते थे या भगा दिया जाता था। अपराधी वहीं बसते चले गये। वहाँ के मूल निवासी रेड इंडियन को बेदखल करते चले गये। उन्हीं अपराधियों की संताने अमेरिकी हैं। कहीं अपराध का जिन आज भी
अमेरिकीयों में कहीं मौजूद तो नहीं ?
सम्भव है। लेकिन इतनी खोज – बीन की आपको ज़रूरत क्यों पड़ी।
बगदाद पतन के बाद अमेरिकी फौजियों की उपस्थिति में बगदाद का संग्रहालय लूटा गया। मेसोपोटामिया की संस्कृति , मोहनजोदड़ो या हड़प्पा संस्कृति की समकालीन या उसके कुछ ही आस – पास की है। उस काल की सांस्कृतिक धरोहरों को अमेरिकी फौजियों ने लुटवा दिया।
कहा जाता है कि सुसंस्कृत कौमे , अपनी – अपनी सांस्कृतिक धरोहरों की हिफाजत करती है। बर्वर कौमे पुरातन धरोहरो को नष्ट कर डालती है। पुर्त्तगीजों तथा बख्तियार खिलजियों ने भारत की सांस्कृतिक धरोहरों को नष्ट किया।
बर्वर लुटेरों ने मंदिरो कब्रों को लूटा। अमेरिका के मानस पुत्र तालिबान ने सारे संसार के विरोध के बावजूद बुद्ध की मूर्तियों को नष्ट किया। अमेरिका , पकिस्तान के पास अपनी कोई सांस्कृतिक धरोहर नहीं है। शायद इसीलिये वे पुरातन सारी चीजों का नष्ट कर डालना चाहते हैं। कुछ लोग भारत में भी हैं और वे भी वही कर रहे हैं या करना चाह रहे हैं , जो तालिबानों ने किया।
सम्भव है कि आप जो कह रहे हों वो सही हो लेकिन – लेकिन नहीं आशुतोष बाबू — द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान हिटलर की सेना ने पीट्सवर्ग को घेर लिया। पीट्सवर्ग को संग्रहालयों का शहर कहा जाता है।
कैथरिन द्वितीय के संग्रहालय के बारे में कहा जाता है कि संग्रहालय के वस्तुओं पर एक मिनट का समय दिया जाय तो अनवरत संग्रहालय देखा जाय तो पूरे 9 वर्ष का समय लगेगा। उस शहर को बचाने के लिये स्टालिन ने शहर के तमाम युवाओं को तीन दल में बाँट दिया। एक दल को हिटलर की सेना से भिड़ा दिया , दूसरे दल को नाजी फौज के सम्पर्क लाइन को काटने में लगा दिया और तीसरे दल को संग्रहालय के पुराने धरोहरों का ट्रक पर लादकर साइवेरिया भेजवाना शुरू कर दिया।
शहरी व्यवस्था महिलाओं तथा बच्चों को सौप दिया। पीट्सवर्ग 900 दिनों तक दुश्मनों से घिरा रहा। अन्तत हिटलर की सेना हारी।
युद्व के बाद रूस में स्टालिन पर इल्जाम लगा कि पीट्सवर्ग के युवाओं के एक दल को नाजी सेना से लड़ने के बदले बेकार चीज़ों को बचाने में उनकी ऊर्जा को नष्ट करवा दिया।
स्टालिन की तो बोलती बंद हो गयी होगी।
नहीं। उसने कहा था कि पितृभूमि अगर हार भी जाते तो बाद में ताकत संजोकर पितृभूमि को लड़कर लौटा सकते थे। लेकिन हजारों वर्षो की हमारी सांस्कृतिक धरोहर नष्ट हो जाती तो उसे कहाँ से लौटाते। फिर कोई कुछ नहीं बोला।
पंडित जी संस्कृति की माला जपने वाले वस्तुत ; संस्कृति को नष्ट करने वाले होते हैं।
कहने की क्या समझने की बात है ?
उपर्युक्त कहानी विकल्प मीमांसा के संपादकीय सलाहकार रहे सिद्वेश्वर नाथ पांडेय द्वारा लिखी गई है। अब वह दिवंगत हैं।