कुछ घटनाएं मन को इतना विचलित कर देती हैं, कि देखकर मन में उठ रहे भावों को शत प्रतिशत बाहर रख देना कई बार मुश्किल हो जाता है। वक्त लगता है, भावनाएं संयमित हो जाती हैं, और तब कुछ लिखने के लिये ऊंगलियां चलती हैं। 20 जुलाई को दिल्ली के जंतर मंतर पर जो हुआ, उसे देखकर मन बहुत बहुत व्यथित हुआ। छात्रों, बच्चों पर लाठी चार्ज! सोशल मीडिया पर लगातार चल रहे विडियो में पुलिस की बर्बरता, मासूमियत से पूछते बच्चे-क्यूं मार रहे हमें, रह-रहकर हमसे सवाल कर रहे हैं कि हम अपने बच्चों से कैसे आंखें मिलाएंगे। कैसे समझाएंगे कि लोकतंत्र में जनता के किसी भी रूप को अपनी बात रखने का अधिकार होता है, और यह तो हमारे देश के वर्तमान और भविष्य दोनों ही हैं।
शायद सरकार और प्रशासन इसे समझने की भूल कर बैठी और कहीं न कहीं एक ऐसा दुर्भाग्यपूर्ण एक्शन लिया गया, जिसकी चर्चा हमेशा इस दिन के आग को जलाकर रखेगी। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया दिखा रही थी, और हम इस बात के लिये गड़े जा रहे थे कि कभी हमने ही कहा था, दिल्ली पुलिस की मुस्तैदी की अपनी एक मिसाल है। यह हर बुरी परिस्थिति में त्वरित एक्शन लेना जानती है। लेकिन ऐसा एक्शन! किसने सोचा था? बच्चों ने तो बिल्कुल नहीं। उन्हें तो बस इतना लगा कि उनकी परिक्षाओं में गड़बड़ियों को दूर करने की मांग में किसी खास व्यक्ति ने भूख हड़ताल की है, तो चल पड़े साथ देने। बात शिक्षा की थी, तो क्या स्कूल क्या कॉलेज। बस छात्र हैं, इतना ही काफी है। मांग लेकर पंक्ति में खड़े हो गये और कारवां बनता चला गया। यह सब बातें यूं ही नहीं कह रही बल्कि इस आंदोलन को अपने चश्मे से थोड़ा देखने और समझने की कोशिश की है।
16 जुलाई गुरूवार का दिन था, जब सीजेपी के आंदोलन को नजदीक से देखने के लिये मेट्रो से जंतर मंतर के लिये निकली। महिला कोच में मेरे सामने वाले बर्थ पर 4 लड़कियां, जिन्हें आज जेन जी के नाम से जाना जाता है, जंतर मंतर जाने पर विचार कर रही थी। किसी ने कहा-वहां क्यों जाना है, तो चारों में एक का जवाब आया अरे तुम्हें पता नहीं सोनम वांगचुक नीट में गड़बड़ी के मामले पर भूख हड़ताल पर बैठे हैं।
पालिका मेट्रो से उतरते ही जंतर मंतर पहुंचने के लिये ऑटो लिया। उन्होंने पूछा धरना साइट जाना है? हां भैया, आप क्या सोचते हैं धरने को लेकर? जवाब दिया- क्या सोचना है, इनकी बात सुननी चाहिये। खैर…धरना स्थल पर पहुंची तो बाहर से ही चहल-पहल नजर आने लगी। सड़क किनारे दो एंबुलेंस खड़ी थी। बाहर पुलिस बैरिकेट्स के साथ मशीन द्वारा सामानों, बैग्स की चैकिंग के बाद एक और सूचिबद्ध जांच फिर धरना स्थल पर एंट्री। नजर दौड़ाकर देखा, बड़ी संख्या में पुलिस, आरएफ सुरक्षा में चुस्त मगर शांत दिख रहे थे, तो वहीं सामने लोगों की काफी भीड़ थी। भीड़ इतनी कि धरने का मंच नजर नहीं आ रहा था, जहां सोनम वांगचुक मिलते। थोड़ी हैरत भी हुई देखकर कि इतने लोग, वह भी काम के दिन? आगे बढ़ी, मीडिया के नाम पर मंच वाले खेमे में जाने की थोड़ी देर की परमिशन मिली।
दरअसल, मीडिया के लिये मंच से कुछ दूरी पर सामने लोहे की रेलिंग(बैरिकेड्स) के साथ एक जगह बनाई गई थी, और इस लंबी रेलिंग के सहारे कुछ मीडिया, यूट्यूबर और समर्थक दूर से सोनम वांगचुक को देख सकते थे। मंच से आगे और रेलिंग के सामने एक छोटा सा स्टेज था, जिस पर खड़े होकर कॉकरोच जनता पार्टी के समर्थक तो कभी विभिन्न परीक्षाओं से जुड़े छात्र अपने मन की व्यथा सुना रहे थे। मैं अपनी खबर के लिये अभिजीत दीप्के या सौरव दास में से किसी एक का इंटरव्यू करना चाहती थी, मगर ऐसा नहीं हो सका। वह मंच पर किसी न किसी भागदौड़ में व्यस्त नजर आये। मंच पर सोनम वांगचुक लेटे दिखे और पास में दो टेबल फैन चल रहे थे। बीच-बीच में अभिजीत दीप्के वांगचुक के पास बैठते और फिर कभी माइक से छात्रों और समर्थकों को संबोधित करने वाले के पास पहुंचते। इसी बीच मंच पर किसी क्षेत्रीय पार्टी, संगठन के नेता को माइक के साथ सरकार को कोसते और शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़ा करते सुना। प्रयास यही था, वहां मौजूद समर्थक उन्हें सुनें। यहां वास्तव में यह समझना मुश्किल हो रहा था कि सीजेपी ने यह आंदोलन कितनी गंभीरता के साथ शुरू किया है। सोचा, मंच से बाहर लोगों के बीच पहुंचती हूं, शायद कुछ और मिल जाये। निकलने से पहले सीजेपी की एक वालंटियर, उर्जा से हमारी बात हुई, जिन्होंने बताया कि यह आंदोलन किसी राजनीति से नहीं बल्कि नीट छात्रों के सुसाइड, गड़बड़ियों और उसके लिये नैतिक जिम्मेदारी के साथ शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की मांग से जुड़ा है।
मंच से बाहर लोगों के बीच पहुंची, उमस भरी गर्मी में पसीने से तर- छात्रों और अन्य लोगों की भीड़ धीरे-धीरे और बढ़ने लगी थी। कई छात्रों से बात हुई। उनमें उत्सुकता, हताशा, उर्जा, और विरोध सभी भाव नजर आ रहे थे। प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक के लिये सरकार के प्रति गुस्सा, सोनम वांगचुक के लंबे भूख हड़ताल पर सरकार का ध्यान नहीं देने से हताशा और शिक्षा तंत्र में आमूल-चूल परिवर्तन की क्रांति में अपनी भागीदारी के लिये उर्जा.. सब मिलकर विरोध जता रहे थे। दरअसल, यह वो छात्र थे, जो अपने भविष्य निर्माण की चाह में लगातार संघर्ष कर रहे थे। सोनम वांगचुक की भावुक अपील ने उन्हें आने पर मजबूर किया। डॉक्टर, वकील, इंजीनियर के साथ परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्र, बीटेक, एमटेक की पढ़ाई करने वाले इस आंदोलन को समर्थन देते नजर आये। वास्तव में वह क्रांति के मूड में नजर आ रहे थे, जैसे उन्हें सोनम वांगचुक जैसे नेतृत्व की तलाश थी। हर तरफ भीड़ ही भीड़। छात्रों के साथ अभिभावक और हर उम्र के लोग इसलिये शामिल नजर आ रहे थे कि वह एक बदलाव का हिस्सा बनना चाहते थे, चाहे वह बदलाव एक लचर सिस्टम का हो या फिर उस सिस्टम को चलाने वाले शीर्ष पर बैठे नेतृत्व से जुडा हो। यहां अलग-अलग तरह के सरकार विरोधी पोस्टर दिखे, जिसे कुछ लोग हाथों में लिये दिखे। कहीं ग्रुप में इंकलाब के नारे तो कहीं युवाओं के जोश भरे गीत। न दिन भर गाते हुए गले में खराश की तकलीफ और न ही भीषण उमस की तपिश की तकलीफ। बस चेहरे की दमक इसी बात के लिये है कि निकल पड़े हैं अपने लिये पूरा आसमान ढूंढने।
गेट के पास बैठी पुलिस भी इनके जोश को चुपचाप देख और महसूस कर रही थी। जैसे-जैसे दिन ढ़लना शुरू हुआ मंच पर राजनीतिक हलचल तेज होने लगी। समाजवादी पार्टी की सांसद डिपल यादव, आप संयोजक व दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, किसान नेता राकेश टिकैत आदि सोनम वांगचुक से मिलने पहुंची उनसे उपवास तोड़ने की अपील की और फिर माइक पर सबको संबोधित करते हुए सरकार पर जमकर हमला बोला। तालियां बजीं, लेकिन बजाने वाले केवल शुरू की एक दो पंक्तियों में शामिल लोग थे। उनके पीछे खड़े छात्र शांत होकर सुन रहे थे। वह किसी पार्टी के समर्थक बनने नहीं आये थे बल्कि मजबूत सिस्टम की रूपरेखा चाहते थे। नजरें सरकार के किसी प्रतिनिधि का इंतजार कर रही थी कि वह सिस्टम सुधारने का संकल्प दिखाये, लेकिन ऐसी कोई सूचना नहीं मिल रही थी, जिसने उन्हें निराश किया। ऐसे में इनकी पूरी उम्मीद सोनम वांगचुक से जुड़ी दिखीं एक प्रसिद्ध शिक्षाविद ने उनके लिये सरकार के सामने मांग रखी है और इसके लिये भूखे हैं।
और इसी भावना के गुबार को और हवा मिली जब दिल्ली पुलिस द्वारा आनन-फानन में जबरदस्ती स्वास्थ्य बिगड़ने का हवाला देते हुए 19 जुलाई शनिवार को सोनम वांग्चुक को धरना स्थल से उठाकर सफदरजंग हॉस्पिटल पहुंचाया गया। इस खबर ने छात्रों को और भी भावुक कर दिया और वह दूर-दूर से बड़ी संख्या में इस आंदोलन से जुड़ गये। 20 जुलाई को संसद मार्च में कई मेट्रो स्टेशन के बंद होने के बावजूद छात्र किसी भी तरह मार्च से जुड़े। शायद इतनी संख्या में छात्र जुड़ेंगे पुलिस प्रशासन को भी अंदाजा नहीं था। उन्हें रोकने के लिये दिल्ली पुलिस ने जिस तरह लाठी चार्ज और आंसू गैस के गोले का इस्तेमाल किया वह काफी अप्रत्याशित था। इस तस्वीर ने सबके मन को द्रवित कर दिया। क्या यह छात्र इस बर्बरता के हकदार थे? पुलिस भी आत्ममंथन करे, यह आवश्यक है। जिन बच्चों पर लाठी पड़ी, वह क्या रक्षक समझ पाएंगे, जवाब भविष्य के गर्त में है।
सीजेपी, अभी तक वह छात्रों के मुद्दे पर डटी हुई है, आगे उनका क्या एजेंडा है, यह बहुत साफ नहीं है, मगर सड़कों पर उतरे देश के उन छात्रों की मांग को कैसे नकारा जा सकता है, जो शिक्षा व्यवस्था को दुरूस्त करने की मांग कर रहे हैं ? अगर सरकार ने इसके लिये कुछ सोचा है, तो संवाद क्यों नहीं करती?
प्रधानमंत्री मोदी ने इससे पहले भी देश के नाम संबोधन दिया है, वैसे ही छात्रों के नाम संबोधन दे सकते हैं। परीक्षा पर चर्चा और देश के सभी छात्रों से सीधा संवाद। एक पारदर्शी व्यवस्था का वादा, जिस पर सबका भरोसा कायम हो सके। वैसे भी अगर भविष्य सुरक्षित हो तो ऐसा कौन सा छात्र है जो अपनी पढ़ाई और कैरियर को दांव पर लगाकर लाठियां खाने के लिये बेवजह सड़कों पर उतरे ?